राफेल डील को लेकर मोदी सरकार घिरती नज़र आ रही है। इस मामले में अब नए खुलासे हो रहे हैं। वेबसाइट द प्रिंट के खबर के मुताबिक फ्रांस के साथ राफेल डील करने से पहले ब्रिटेन और जर्मनी ने भारत सरकार को यूरोफाइटर टाइफोन लड़ाकू विमान कम कीमत में देने की पेशकश की थी। लेकिन फिर भी मोदी सरकार ने राफेल की खरीद को ही मंज़ूरी दी।

खबर के मुताबिक यूरोफाइटर टाइफोन भी राफेल जितना सक्षम विमान है और भारतीय वायुसेना उसे अपनी ज़रूरत के हिसाब से सक्षम भी बता चुकी थी। इस खबर से मोदी सरकार पर लग रहे उस आरोप को बढ़ावा मिलता है जिसमें राफेल डील में घोटाले का आरोप लगा था।

यूरोफाइटर टाइफोन के सौदे में विमान सस्ता होने के साथ साथ टेक्नोलॉजी का भी ट्रान्सफर किया जा रहा था और जहाज़ भारत में बनता जबकि राफेल डील में ऐसा नहीं है।

बता दें, कि राफेल डील फ़्रांस और भारत के बीच हुई जंगी जहाज़ की डील है। राफेल डील की शुरुआत यूपीए सरकार के समय हुई थी। ये डील 2016 में पूरी हुई है। कांग्रेस का आरोप है कि पहले डील में एक जहाज़ की कीमत 526 करोड़ थी जिसको अब 1,488 करोड़ में खरीदा गया है। आरोप है कि इससे देश को हज़ारों करोड़ का नुकसान हुआ है।

साथ ही पहले भारत की सरकारी कंपनी हिंदुस्तान ऐरोनॉटिक्स फ्रांस की कंपनी के साथ मिलकर ये जहाज़ बनाने वाली थी लेकिन मोदी सरकार द्वारा करी गई डील में अब जहाज़ अनिल अम्बानी की कंपनी बनाएगी।

एक विमान पर 453 करोड़ का फायदा

126  यूरोफाइटर टाइफून विमानों की कीमत 17.5 अरब यूरों बताई गई थी। मतलब एक विमान की कीमत हुई 138 मिलियन यूरो (एक हज़ार 35 करोड़ रुपये)। जबकि राफेल सौदे में 36 विमानों को 7.1 अरब यूरो में खरीदा गया। एक राफेल विमान की कीमत 197 मिलियन यूरो (एक हज़ार 488 करोड़ रुपये)।

भारतीय वायुसेना ने यूरोफाइटर टाइफोन को भी बताया था सक्षम

2012 में जब खरीद के लिए जहाज़ों को भारतीय वायुसेना ने टेस्ट किया था। तब राफेल और यूरोफाइटर टाइफोन को ही सक्षम बताया गया था। जबकि F-16 ग्रिपेन और F/A-18 विमानों को अस्वीकार कर दिया गया था।

तब सरकार ने राफेल को इसलिए चुना क्यों की उस समय राफेल की कीमत यूरोफाइटर टाइफोन से कम थी। 2014 में बनी मोदी सरकार ने पुरानी राफेल डील को रद्द कर विमान लेने के लिए नयी डील की घोषणा की।

इसके बाद जुलाई 2014 में जर्मनी ने यूरोफाइटर टाइफोन को फिर से कम कीमत पर देने की पेशकश की। लेकिन मोदी सरकार ने कहा कि नयी डील में केवल राफेल पर ही विचार किया जाएगा।

ये बात अगस्त 2014 में वित्त मंत्री अरुण जेटली ने भी लोकसभा में मानी थी कि पुरानी डील में राफेल की कीमत कम थी।

टेक्नोलॉजी ट्रान्सफर का भी होता फायदा

जर्मनी ने अपनी यूरोफाइटर टाइफोन विमान डील में विमानों को भारत में बनाने और टेक्नोलॉजी ट्रान्सफर का भी वादा किया था। इससे देश में 20 हज़ार नई नौकरियां भी पैदा होती। लेकिन राफेल डील 2016 के मुताबिक राफेल विमान भारत में नहीं बनाए जाएँगे।

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