यह दौर भी आपातकाल जैसा है जब मीडिया का मुंह बंद कराने की कोशिश की जा रही है। इस बार मीडिया पर कंट्रोल विज्ञापन के रूप में घूंस देकर किया जा रहा है। ठीक वैसे ही जैसे कुत्ते के मुंह में हड्डी दे दी जाती है तो वो वफादार बना रहता है, भौकता नहीं। उसी तरह सरकार विज्ञापन दे देती है ताकि मीडिया हाउस उनके वफादार बने रहे।

नियंत्रण का दूसरा हथियार यह है कि, निगरानी और डर का माहौल पैदा किया गया है। डराया जाता है कि तुम निगरानी में हो और मोदी सब सुन रहे हैं और सरकार की आलोचना मना है। फिर भी अगर आवाज उठाओगे तो तुम्हारे पीछे सीबीआई जैसी कोई एजेंसी छोड़ दी जाएगी।

इनका तीसरा हथियार वह दबाव है जिससे विरोध की हर आवाज दबाने की कोशिश की जाती है। जिससे चुप कराना चाहते हैं, ठीक वैसे ही जैसे एनडीटीवी को दबाने की कोशिश की गई। इस सरकार का पूरा का पूरा रवैया जो है वह टोटलिटेरियन की तरह है जो चाहता है कि उसका पूरा प्रभुत्व हो। देश के इतिहास, भूगोल ,संस्कृति हर चीज पर सरकार का पूरा नियंत्रण हो।

और इसी तरह से पूर्ण प्रभुत्ववादी बनने के लिए यह सरकार एक एक कदम आगे बढ़ती जा रही है। किसान परेशान हो रहा है, लोग नौकरी खो रहे हैं, सरकार और जनता के बीच एक शून्य बनता जा रहा है।

भारत का इतिहास बताता है जिस किसी सरकार ने भी मीडिया पर हाथ उठाया उसका हाथ जल गया, निर्णय वापस लेना पड़ा है। चाहे वो राजीव हो चाहे इंदिरा गांधी।

अब ये लोग मीडिया के एक ख़ेमे को दूसरे ख़ेमे के खिलाफ खड़ा कर देना चाहते हैं, यही इनकी साजिश है। और आप इस साजिश में मत फंसिए, आप एक दूसरे के साथ खड़े हो।

यह एक दूसरे को जज करने और शक करने का समय नहीं है। मुसीबत की घड़ी में एक दूसरे के साथ खड़े रहिए तभी अपना सही अस्तित्व बनाए रख पाओगे। अगर अपनों के साथ और अपने साथ अभी नहीं खड़े होगे तो कब खड़े होंगे।

सरकार की नजर सोशल मीडिया पर रहती है इसलिए जब आप जैसे लोग रवीश कुमार जैसे निडर लोगों के साथ खड़े हो जाएंगे तो उन पर दबाव बनेगा कि इतने लोग एक साथ खड़े हैं।

जिसे आप निष्पक्षता समझते हैं वह निष्क्रियता है।जैसे कि एक तरफ एक को आग लगाई जा रही हो और एक आग लगा रहा हो फिर भी आप कहें कि आप निष्पक्ष हैं। आपको एक पक्ष लेना होगा, अन्याय के खिलाफ लड़ना होगा। सूचनाओं के सही प्रसार में किसी भी तरह की बाधा बर्दाश्त ना करें। आप लोगों को विरोध करना होगा, प्रधानमंत्री को जानने दो कि विरोध हो रहा है।

विदेशी मीडिया को सूचित होने दें कि आप सरकार से असहमत हैं। मीडिया का स्पेस बेहद कीमती है मंत्रियों को जगह देकर उसे प्राइम ना समझे, उसे बेहद खास ना समझे। आपकी विश्वसनीयता मंत्रियों की वजह से नहीं है।

खुद के काम करने वाली जगह इंडियन एक्सप्रेस का हवाला देते हुए कहते हैं कि, राजकमल ने जिस तरह से वैकेया नायडू को इतना बड़ा स्पेस दिया है लिखने के लिए, वह ठीक नहीं है। जो इंसान दूसरी तीसरी कक्षा की नोटबुक ना भर पाए वो इतना बड़ा लेख लिखकर क्या बताए जा रहा है। बड़े मंत्रियों को जगह देकर आप कोई शांति नहीं पाते, बल्कि तनाव और दबाव में ये साथ नहीं देंगे।

किसी रियायत के बदले मंत्रियों-नेताओं को जगह देने की बजाय असहयोग करें। विरोध का सबसे बेहतर तरीका है असहयोग। जैसे मीडिया कवरेज आतंकियों के लिए ऑक्सीजन का काम करता है, ठीक उसी तरह से इन मंत्रियों के लिए भी। इनको कवरेज देना बंद करें, इनको फुटेज देना बंद करें।

यह कवरेज और फुटेज का हवाला देकर मोदी के सामने चाटुकारिता करते हैं। जब कोई अप्रिय घटना घटती है और सरकार को असुविधा होती है तो वह कोशिश करते हैं कि, आपका ध्यान भटका दें और कोई और स्टोरी चले। आप इससे बचें, आपकी कठिन मेहनत से अगर सरकार की चिंता बढ़ती है तो जान लीजिए सही राह पर हो और सही काम कर रहे हो।

अरुण पुरी की कही गई बात का हवाला देते हुए कहते हैं ‘न्यूज़ वह है जिसे सरकारें दबाना और छिपाना चाहती है, बाकी सब कुछ प्रोपोगेंडा है यानी की प्रचार।’ हमारे पास तीन सुरक्षा साधन हैं एक हमारी एकता दूसरी कि, जब सरकार न्यायपालिका को कमतर आंके इसको घेरें, न्यायपालिका को निडर रहने दें। तीसरी कि, अपने पाठकों और दर्शकों की सुरक्षा करना है।

इसके लिए उनके हित की बात करें, उनके लिए बेहतर से बेहतर स्टोरी लाएं, भले ही वह दुर्लभ क्यों न हो। मुझे ऐसा लगता है कि आने वाले दिनों में ऐसा ही माहौल रहा तो सही सूचनाओं का प्रचार-प्रसार करना बेहद मुश्किल हो जाएगा। इसलिए अब सभी को साथ खड़ा होना होगा और ऐसी प्रभुत्ववादी मानसिकता के खिलाफ लड़ना होगा।

और अगर वह दिन आ भी गया कि, पूरी मीडिया पर सरकार का कंट्रोल हो जाएगा, तब देख लेना लोगों को अंदाजा लग जाएगा कि यह उनके हित में नहीं है और लोग साथ छोड़ देंगे। यह सरकार बचेगी तो सिर्फ मरी हुई गाय के साथ और इस सरकार के हाथ कुछ नहीं बचेगा।

-(प्रेस की आज़ादी पर अरुण शौरी के व्यक्तव्य के कुछ अंश )

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