पिछले तीन सालों में मोदी सरकार अनाज के आयात को 68 गुना बढ़ा चुकी है, जबकि देश में अनाज का उत्पादन लगातार बढ़ रहा है। 2014-15 में 134 करोड़ का सालाना अनाज आयात किया जा रहा था लेकिन 2016-17 में अनाज आयात पर 9 हज़ार 9 करोड़ रुपये खर्च किये गए हैं।

देश में किसानों की हालत बद से बदतर होती जा रही है। किसान की फसल के दाम बाज़ार में गिर रहे हैं और सरकार उसको उचित न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) दे नहीं रही है।

गौरतलब है कि 2014 लोकसभा चुनाव में नरेंद्र मोदी ने किसानों से 50% एमएसपी बढ़ाने का वादा किया था लेकिन अभी तक ऐसा नहीं हुआ है। बाज़ार दाम से सरकारी दाम की ये पूरी किसान विरोधी कहानी सरकार ही लिख रही है।

एक तरफ सरकार अनाज आयात पर टैक्स ड्यूटी घटा रही है और दूसरी तरफ अनाज निर्यात पर पाबंदिया लगा रही है। 2014-15 में एक लाख 31 हज़ार करोड़ का अनाज निर्यात किया गया था लेकिन 2015-16 में ये एक लाख 8 हज़ार करोड़ रहा। किसान की आय के सभी स्रोत बंद हो रहे हैं।

इस पूरी कहानी को बहुत ही चालाकी से लिखा जा रहा है। देश में लगातार अनाज उत्पादन बढ़ रहा है फिर भी सरकार अनाज के अनुमान घटाकर बता रही है और फिर आयात को बढ़ा रही है। एक ऐसा खेल जिसमें किसान भी बर्बाद हो रहा है, जनता महंगे दामों पर वस्तुएं खरीद रही है और फायदा निजी वितरकों और कंपनियों को हो रहा है।

मई 2016 में, केन्द्रीय कृषि मंत्रालय ने अनुमान लगाया कि 2015-16 में 124 मिलियन टन अनाज उत्पादन होगा। ये अनुमान चौंकाने वाला था क्योंकि देश में अधिक वर्षा और कई क्षेत्रों में सूखा होने के बावजूद लगातार अनाज का उत्पादन बढ़ रहा है। इसके बाद सरकार ने 2016-17 सार्वजनिक वितरण प्रणाली (पीडीएस) के लिए 23 मिलियन टन गेंहू दिया। जबकि 2015-16 में ये 28 मिलियन टन था।

इसके बाद गेंहू पर आयात टैक्स ड्यूटी को सितम्बर 2016 में 25% से घटाकर 10% कर दिया गया और दिसम्बर 2016 में इसे पूरी तरह हटा लिया गया। बता दें, कि  2015-16 में अनाज उत्पादन सरकार के अनुमान से कहीं ज़्यादा 252 मिलियन टन रहा।

सरकार द्वारा अनाज के कम उत्पादन के अनुमान के कारण अप्रैल से दिसम्बर 2016 के बीच आटे का भाव बढ़ गया। इसी के चलते सरकार ने आयात पर से टैक्स ड्यूटी घटा दी। अंत में फायदा निजी वितरक और कंपनियों का हुआ जिन्होंने महंगा आटा भी बेचा और सस्ते दामों पर गेंहू भी खरीदा।

ये भयानक खेल उस देश में चल रहा है जिसकी 68% आबादी 2011 की जनगढ़ना के अनुसार खेती पर आश्रित है। ये सब उस पूंजीवादी व्यवस्था का हिस्सा हो सकता है जिसे विश्व बैंक और विश्व व्यापर संगठन विभिन्न देशों में समर्थन देते हैं।

जिनके मुताबिक भारत समेत कई विकासशील देशों को किसानों को दी जा रही सुविधाएँ और सहायता घटा देनी चाहिए और उनकों शहरों में लाकर काम करने की व्यवस्था पर ज़ोर देना चाहिए।

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