बजट 2018 को किसानों का बजट कहा जा रहा है। अखबारों से लेकर टीवी न्यूज़ चैनल तक “किसानों पर मेहरबान मोदी सरकार ’ हैडलाइन नज़र आ रही है। लेकिन क्या मोदी सरकार सही में किसानों पर मेहरबान है या फिर आकड़ों में उलझाकर 2019 की तैय्यारी हो रही है।

बजट में किसानों को लेकर कई घोषणाएं हुई। उसका विश्लेषण करके देखते हैं कि असल में ये घोषणाएं किसान के लिए कितनी हितकारी हैं।

न्यूनतम समर्थन मूल्य

बजट पेश करते हुए वित्त मंत्री अरुण जेटली ने कहा कि सरकार रबी पर न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) लागत से डेढ़ गुना दे रही है और 2018-19 में भी इतना ही दिया जाएगा। अगर आकड़ों को देखा जाए तो ये झूठ है।

सरकार के ही आकड़ों के मुताबिक, 2014-15 में गेहूं की लागत थी 1056.1 रुपये प्रति क्विंटल थी और एमएसपी मिला 1400 रुपये प्रति क्विंटल। 2016-17 के लिए गेहूं की प्रति क्विंटल लागत थी 2345 रुपये थी मगर सरकार ने एमएसपी दिया 1525 रुपये। भारतीय खाद्य निगम की वेबसाइट पर 2017-18 के लिए प्रति क्विंटल गेहूं की लागत 2408.67 रुपये है और एमएसपी 1625 रुपये।

अन्य रबी फसलों की बात करे तो उनकी स्तिथि भी नीचे दिए गए चार्ट में देखी जा सकती है। किसी का भी एमएसपी डेढ़ गुना ज़्यादा नहीं है। C2 फसल की वो कीमत होती है जिसमें किसान की लागत भी जोड़ी जाती है। उसमें 50% एमएसपी जोड़ा जाता है लेकिन सरकार दे उससे कम रही है।

दरअसल, मोदी सरकार जिस एमएसपी की बात कर रही है उसके लिए वो पहले फसल पर किसान की लागत घटा रही है और उसके बाद एमएसपी डेढ़ गुना ज़्यादा हो रहा है।

किसान की आय

एक बार फिर वित्त मंत्री अरुण जेटली ने घोषणा की कि 2022 तक किसानों की आय दोगुनी कर दी जाएगी। ये दावा सुनने में बहुत अच्छा लगता है लेकिन इसकों ज़मीन पर उतारना मुश्किल है। पहली चीज़, नेशनल सर्वे के मुताबिक, देश में औसतन किसान की आय 2 हज़ार रुपये प्रतिमाह है। तो अगर उसकी आय 2022 तक दुगुनी होती है तो भी 4 हज़ार प्रतिमाह होगी। जबकि वर्तमान स्तिथि ये है कि देश में औसतन किसान को 33 से 34 हज़ार सालाना लोन चुकाना होता है।

किसान की आय दुगुनी करना समस्या का समाधान नहीं है। सरकार अगर किसानों का जीवन स्तर सुधारना चाहती है तो उसे किसान की आय उसके ऋण से ज़्यादा करनी होगी। क्योंकि उस समय तक किसान का लोन भी बढ़ेगा।

अब किसान की आय दुगुनी करने का सवाल। अगर 2022 तक सरकार किसानों की आय दुगुनी करना चाहती है तो उसे कृषि विकास दर लगभग 12% की दर से लगातार बढ़ानी होगी। मोदी सरकार में कृषि विकास दर की बात करे तो ये पिछले चार सालों में सबसे ख़राब स्तिथि में है। गौरतलब है कि सेंटर स्टेटिस्टिक्स ऑफिस (सीएसओ) के मुताबिक, 2017-18 में कृषि विकास दर 2.1% रही है जो पहले की दर 4.9% के मुकाबले कम है।

कृषि बाज़ार

बजट के दौरान वित्त मंत्री अरुण जेटली ने बताया कि किसानों की सुविधा के लिए गावों में 22 हज़ार कृषि बाज़ार बनाए जाएँगे। इसके लिए 2 हज़ार करोड़ रुपये आवंटित किये गए हैं। यहाँ भी सरकार ने बजट में पर्याप्त  राशि से नहीं केवल दावों से किसानों को खुश करने की कोशिश की है।

अगर हिसाब लगाया जाए तो 2 हज़ार करोड़ रुपियें में 22,000 कृषि बाज़ार बनाने के लिए एक बाज़ार को लगभग 9 लाख रुपियें मिल पाएँगे। क्या 9 लाख रुपये में एक कृषि बाज़ार बनाया जा सकता है?

किसानों के लिए ऋण पैकेज

बजट में घोषणा की गई है कि किसानों को लोन देने के लिए 10 लाख करोड़ का क्रेडिट दिया गया है। लेकिन किसान जो पहले से ही लोन के नीचे दबा है वो और अधिक लोन क्यों लेगा। किसानों की मांग है कि या तो उनके वर्तमान लोन को माफ़ किया जाए या फिर उनकी आय इतनी बढ़ाई जाए कि वो लोन को वापस कर सके।

इस सन्दर्भ में अखिल भारतीय किसान सभा का कहना है कि लोन क्रेडिट तो बढ़ा दिया लेकिन इसकी वितरण व्यवस्था के बारे में खाका पेश नहीं किया गया है। गौरतलब है कि अक्सर देखा गया है कि सरकारें किसान को लोन के नाम पर बड़ी-बड़ी कंपनियों को लोन बाटती हैं। अखिल भारतीय किसान सभा के मुताबिक, लोन पैकेज का 41% हिस्सा ही छोटे और मध्यम वर्गीय किसान को मिलता है।

 

 

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