“Grand Illusion: The GSPC Disaster and the Gujarat Model” सुबिर घोष की लिखी और प्रन्जॉय गुहा द्वारा प्रकाशित नई किताब है। इस किताब में ये बताया गया है कि कैसे गुजरात के मुख्यमंत्री रहते हुए नरेंद्र मोदी ने इस बात को बढ़ावा दिया कि राज्य की सरकारी कंपनी GSPC लाखों करोड़ रुपये की गैस निकालेगी।

इसके लिए कंपनी में उद्योगपतियों को हिस्सेदार बनाया गया और गैस खोजने के लिए सरकारी बैंकों से हज़ारों करोड़ का कर्ज़ दिया लेकिन जितना दावा किया गया था उससे बहुत कम मात्रा में गैस मिली।

इस सब के बीच एक बड़े घोटाले को अंजाम दिया गया और अब मोदी सरकार चाहती है कि राष्ट्रीय पेट्रोल और गैस कंपनी ONGC GSPC को खरीद ले।

कैसे हुई शुरुआत

26 जून 2005 को गांधीनगर में मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी ने प्रेस कांफेर्रेंस में घोषणा किया कि गुजरात स्टेट पेट्रोलियम कॉर्पोरेशन GSPC आंध्र प्रदेश के तट पर कृष्णा-गोदावरी बेसिन में गैस निकालेगी।

मोदी ने घोषणा की कि गैस का मूल्य 2 लाख करोड़ रुपए होगा, और यह गुजरात को ‘भारत की आर्थिक महाशक्ति’ बनाने में मदद करेगा।

उन्होंने कहा कि इस खोज से अगले दो दशकों में 10,000 करोड़ रुपये की विदेशी मुद्रा की वार्षिक बचत होगी। 75-80 मिलियन मीट्रिक क्यूबिक मीटर (एमएमसीएम) गैस उत्पादन होने का दावा किया गया था।

उन्होंने कहा, गुजरात सरकार ने इसपर अब तक 250 करोड़ रुपये खर्च किए हैं, और अब 1,500 करोड़ रुपये अतिरिक्त खर्च करेंगे।

कुछ समय बाद 17 जुलाई 2008 को फिर से मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी ने प्रेस कांफ्रेंस को बुलाकर घोषणा की कि GSPC द्वारा 2 लाख करोड़ रुपये की नहीं बल्कि 4 लाख करोड़ रुपये की गैस खोजी जा ही है। इस परियोजना में मुकेश अम्बानी और गौतम अडानी जैसे उद्योगपतियों की निजी कंपनियों ने भी साझेधारी की।

घोटाला

ड्रिल करने के लिए लागत का अनुमान 1.2 लाख रुपये लगाया गया था लेकिन ड्रिल की लागत 7.65 लाख रुपये आई। इससे साफ़ ज़ाहिर है कि प्रोजेक्ट को लेकर सही से योजना नहीं बनाई गई थी। इस प्रोजेक्ट में गैस निकल नहीं रही थी लेकिन उसकी लागत बढ़ती जा रही थी।

गुजरात सरकार ने भारतीय नियन्त्रक एवं महालेखापरीक्षक (CAG) की ओर से आपत्ति जताने के बावजूद GSPC को 20 हज़ार करोड़ रुपये का कर्ज़ दिलाया। आरोप है कि निजी कंपनियों ने इस पैसे का दुरुपयोग किया।

CAG ने अपनी रिपोर्ट में कहा है कि कंपनी ने लागत, प्रौद्योगिकी और गैस की कीमतों से जुड़े जोखिमों को लेकर ठीक से योजना नहीं बनाई। इसके परिणामस्वरूप इस परियोजना का भविष्य खतरे में पड़ा।

इस बीच, कंपनी की कुल उधारी 2010-11 में 7 हज़ार 126.67 करोड़ रुपये से बढ़कर 2014-15 तक 19 हज़ार 716.27 करोड़ रुपये हो गई, जो 177% की बढ़ोतरी है।

CAG ने अपनी दो गहन रिपोर्टों में कहा है कि GSPC और अन्य निजी कंपनियों के बीच कई लेन-देन में लगातार विसंगतियां दर्ज की गईं, जिनकी वजह से सरकारी खज़ाने को नुकसान हुआ और अनुचित वित्तीय निजी कंपनियों को लाभ। इन निजी कंपनियों में अम्बानी और अडानी की कम्पनियाँ भी शामिल हैं।

सवाल

सवाल ये उठता है कि जब उस मात्रा में गैस मिली ही नहीं जो दावा किया गया था तो पैसा कहाँ गया। कांग्रेस नेता जयराम रमेश ने भी इस परियोजना पर सवाल उठाते हुए कहा था कि कोई भी कंपनी जब पैसा लेकर काम शुरू करती है तो नया ढांचा बनाती है और कामगारों की संख्या बढ़ाती है। जबकि इस बीच GSPC के बिल ऐसा कुछ नहीं दिखाते की उन्होंने अधिक नये लोगों को नौकरी दी।

जयराम रमेश का आरोप है कि कंपनी को गैस के नाम पर सरकारी बैंकों से पैसा दिलाया गया। उस पैसे का परियोजना में शामिल निजी कंपनियों ने अपने फायदे के लिए प्रयोग किया।

अब क्या चाहती है मोदी सरकार

मोदी सरकार चाहती है कि देश की राष्ट्रीय पेट्रोल और गैस कंपनी ONGC, GSPC को खरीद ले। इस प्रकार GSPC का लिया हुआ कर्ज़ ONGC चुकाएगी और निजी कम्पनियाँ आसानी से निकल जाएंगी।

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