एक तरफ देश में बढ़ती बेरोज़गारी से लोग परेशान हैं वहीं मोदी सरकार ने एक अन्य मज़दूर विरोधी कदम उठाया है। सरकार ने एक ऐसे कानून को मंज़ूरी दे दी है जिसके बाद उद्योग कभी भी नौकरी करने वालों को रख या निकाल सकते हैं।

मतलब निश्चित समय के लिए काम कराया जाएगा और ज़रूरत पूरी होते ही निकाल दिया जाएगा। इससे रोज़गार की सुरक्षा खत्म हो गई है। उन लोगों की नौकरी पर भी खतरा पैदा हो गया है जो अब तक अवैध तरीके से नौकरी से निकालने के विरुद्ध मुकदमा कर सकते थे।

मोदी सरकार  का ये कदम मज़दूरों के तो विरुद्ध है लेकिन उद्योगपतियों के हित में है। ट्रेड यूनियनों ने दशकों से इस तरह के क़दमों का विरोध किया है। पहले ये कानून सिर्फ ठेका रोज़गार पर लागू होता था लेकिन अब सभी क्षेत्रों में ऐसा करा जा सकता है।

पिछले हफ्ते, श्रम मंत्रालय ने एक प्रमुख कानून में संशोधन किया और एक गजट अधिसूचना जारी की और एक नया प्रावधान किया जिससे उद्योग के किसी भी क्षेत्र में मज़दूरों को “एक निश्चित अवधि के लिए रोज़गार के अनुबंध” पर भर्ती करने की अनुमति मिल सके।

ये कानून इससे पहले 2003 में, तत्कालीन भाजपा सरकार ने लागू किया था लेकिन यूपीए सरकार ने 2007 में इसे खत्म कर दिया था। अब, भाजपा सरकार फिर से इसे वापस ले आई और यह विचार 2015 से ही इसे फिर से वापस लागू करने की बात चल रही थी।

सीआईटीयू के महासचिव तपन सेन ने कहा, “इस अधिसूचना के माध्यम से अब उन्होंने स्थायी रोज़गार की अवधारणा को नष्ट कर दिया है।” पूरे देश में ट्रेड यूनियनों ने नए नियमों का कड़ा विरोध किया है और जब तक वे वापस नहीं हो जाते, तब तक लड़ाई लड़ने की कसम खाई है।

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