भारत वैश्विक भूख सूचकांक (ग्लोबल हंगर इंडेक्स) में 119 देशों की सूची में 100वें नंबर पर आया है। इससे ख़राब हालत किसी भी ऐसे देश की नहीं होगी, जो ख़ुद इतना अन्न उपजाता हो। आंकड़े तो याद करने और थोड़े समझने की चीज़ है, लेकिन ज़मीन की हालत इससे भी ज़्यादा ख़राब है।

अभी भारत में लगभग 20 करोड़ लोग रात में भूखे सो रहे हैं। कई हज़ार लोग सिर्फ़ और सिर्फ़ उपेक्षा के कारण मौत के शिकार हो रहे हैं। देश में भूख, स्वास्थ्य, ग़रीबी, शिक्षा जैसी आधारभूत चीज़ों का आंकड़ा आपको डराएगा।

इस भूख का एक काला सच सरकार और बाज़ार की मिलीभगत वाली कालाबाज़ारी भी है।

जीडीपी और अर्थव्यवस्था के बड़े- बड़े टर्म में लोगों को फंसाने वाली सरकारें असल में क्या कर रही हैं, अंदाज़ा लग जाएगा।

छत्तीसगढ़, उड़ीसा, झारखंड, बिहार, महाराष्ट्र के कई पिछड़े इलाकों में ये भूख ख़ुद अपना दम तोड़ देती है।

सिर्फ़ झारखंड के दो बड़े अस्पताल (रांची और जमशेदपुर) में अगस्त महीने में 300 से ज़्यादा बच्चों की मौत कुपोषण से हुई थी। दावे के साथ कह रहा हूं कि दूसरे ज़िलों को मिलाकर हज़ारों जानें चल जाती है। पूरे झारखंड का ताजा आंकड़ा नहीं है, लेकिन स्थिति काफ़ी भयानक है।

उत्तर प्रदेश में एक ही जगह गोरखपुर से पूरे राज्य की स्वास्थ्य व्यवस्था का पता चल रहा है। बिहार में नीतीश जी अभी भी अच्छी स्वास्थ्य नीति लाने पर सोच ही रहे हैं(कल ही बोला था)। छत्तीसगढ़ के तरफ़ कोई देखना भी नहीं चाहता।

UNICEF, NFHS या indiaspend.org की वेबसाइट पर जाकर देखिए कि देश में भूखमरी, कुपोषण, महिलाओं में एनीमिया (ख़ून की कमी) की क्या हालत है।

सरकार की नीतियां एक विशेष वर्ग के लोगों तक सिमट कर रह चुकी है।

देश की 59 प्रतिशत संपत्ति पर 1 प्रतिशत लोगों का कब्ज़ा है, आप और हम मुंह बाये अपने पारिश्रमिक को भी समझ नहीं पा रहे हैं।

आंकड़ों से आपको ओवरलोड नहीं करना चाहता, लेकिन एक बीमार और भूखे राष्ट्र में जब सरकार स्वास्थ्य और शिक्षा पर जीडीपी का 2-3 प्रतशित ख़र्च करती है, तो 200 और 1000 करोड़ की मूर्ति बनने पर मेरा भी ख़ून खौलता है। और इसी भूख के कारण कोई बंदूक भी उठाने को तैयार है।

पोस्ट – साकेत आनंद

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