जब इस देश में सबसे ज्यादा तादाद किसान और मजदूर वोटरों की है तो उनके मुद्दे कभी सबसे बड़े मुद्दे क्यों नहीं बन पाते! और इस बार जैसे हालात बने हैं, क्या आगामी 2019 के चुनाव में सत्ता परिवर्तन के साथ ही व्यवस्था परिवर्तन कर देने के लिए किसान और मजदूर तैयार दिख रहे हैं!

ऐसे ही तमाम गंभीर सवाल पर सधा हुआ लेख लिखते हैं वरिष्ठ पत्रकार पुण्य प्रसून बाजपेई। वह कहते हैं कि ‘मोदी के सामने कोई नेता नहीं टिकता लेकिन देश में कोई मुद्दा बड़ा हो जाए तो क्या मोदी का जादू गायब हो जाएगा ?

और जब यह मुद्दा मजदूरों और किसानों का हो, जो इस देश की सबसे बड़ी आबादी है, जिनका एक साथ आ जाना अपने आप में बहुमत हो जाता है, तब इसकी संभावना ज्यादा लगती है। क्या इसे एक बड़ा मुद्दा बनाकर आगामी चुनाव में किसी व्यक्तित्व के कद को छोटा साबित कर सकते हैं !

वाजपेई कहते हैं कि, ऐसे ही एक बार इंदिरा का कद राजनीति में बेहद बड़ा हो गया था लेकिन जब मुद्दा बड़ा हुआ तो जेपी का आंदोलन बढ़ा और निर्विवाद रूप से सबसे बड़ी नेता रही इंदिरा गांधी एक दो साल के अंदर ही सत्ता से बेदखल हो गईं।

ऐसे ही संकेत इस बार भी लग रहे हैं। एक तरफ भाजपा जीतती जा रही है, भाजपा का राजनीतिक विस्तार हो रहा है और संघ का भी। फिर भी देश भर में एक राजनीतिक शून्यता बढ़ती जा रही है। जिससे जीत कर भी ये हार जा रहे हैं।

क्या इसी राजनीतिक शून्यता के बीच किसानों मजदूरों का मुद्दा इतना बड़ा हो सकता है कि मोदी जैसे राजनेता का कद छोटा हो जाए !

ऐसे ही तमाम अटकलों के साथ साथ कुछ तथ्यों को रखते हुए पुण्य प्रसून बाजपेई अपने लेख के माध्यम से अंदाजा लगाते हैं कि एक बड़ा राजनैतिक सामाजिक परिवर्तन होने वाला है।

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