राजस्थान पत्रिका बड़ा अख़बार है। इसके संपादक गुलाब कोठरी का संपादकीय पढ़िए। राजस्थान में प्रस्तावित नए विधेयक के बारे में लिखा है। मेरा पोस्ट भी इस विधेयक पर इसी पेज पर है। राजस्थान पत्रिका ने लगातार आवाज़ उठाई है।

सबसे पहले गुलाब कोठारी ने ही लिखा था कि किस तरह विज्ञापन रोक कर उनके अख़बार को वित्तीय रूप से कमजोर किया जा रहा है और अब वे बग़ैर सरकारी विज्ञापन के ही अख़बार चलाएँगे।

हिन्दी में भी कुछ लोग हैं, जो अपने बिजनेस को दाँव पर लगाकर हस्तक्षेप और नियंत्रण का विरोध कर रहे हैं। मुझे पता है कि लोग इस अखबार का अतीत भी खंगालेंगे लेकिन जो वर्तमान में खड़ा होता है गिनती उसकी होनी चाहिए ।

वहाँ से शुरू होनी चाहिए। आज कल हर सवाल और साहस को ध्वस्त करने के लिए लोग लगा दिए जाते हैं। जब तक आप संत नहीं हैं तब तक सवाल नहीं कर सकते। संत सिर्फ सरकार और उसमें बैठे नेता हैं। जल्दी ही उन लोगों को तैनात कर दिया जाएगा जो गुलाब कोठारी पर गोले और गालियाँ दागेंगे। तब आप कहाँ थे पूछ कर ।

डरा देने के इस दौर में जो नहीं डर रहा है, उसकी हिम्मत को पहचानिए। आसान नहीं है इतना मुखर होकर लोकतंत्र विरोधी कानून का विरोध करना। यह बिल प्रेस और नागरिकों के ख़िलाफ़ है।

अधिकारियों के भी ख़िलाफ़ है। आवाज़ दबाने की हर कोशिश का विरोध होना चाहिए। किसी भी सरकार का मूल्याकंन पहले इस बात से होना चाहिए कि प्रेस कितना स्वतंत्र है न कि फ़्लाई ओवर या एयरपोर्ट से ।

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