हमारे देश में महिलाओं के प्रति बढ़ते अपराध एक बड़ी समस्या है। महिलाओं के प्रति बढ़ते अपराध को रोकने के लिए देश में तमाम तरह के कानून हैं लेकिन फिर भी हिंसा से लेकर बलात्कार तक की घटनाएँ कम नहीं हो रही हैं। इसका एक बड़ा कारण इस तरह के अपराधों में आरोपियों को सज़ा न मिलना है।

आज भी देश में ऐसे बहुत कम आरोपी हैं जिन्हें इन मामलों में सज़ा मिलती है। अगर फर्ज़ी मामलों की भी बात करे तो इसकी दर बहुत कम है। इस कारण बहुत सी महिलाएं और उनके परिवार के लोग इस तरह के अपराधों के खिलाफ आवाज़ नहीं उठाते हैं। महिलाएं सालों तक इस तरह के शोषण का शिकार बनती रहती हैं।

महिला अपराधों में सज़ा दिलाने में गुजरात की हालत भी बदतर है। “बेटी बचाओं बेटी पढ़ाओ” का नारा देने वाले प्रधानमंत्री मोदी के गृहराज्य गुजरात में महिलाओं के खिलाफ अपराधों के मामलों में राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो 2016 की रिपोर्ट के मुताबिक केवल 3% को सज़ा मिलती है। सज़ा मिलने की ये दर पूरे देश में सबसे कम है।

ये बात ठीक है कि सज़ा मिलने का फैसला अदालत में होता है लेकिन अदालत में फैसला सबूतों के आधार पर होता है और वो जुटाने की ज़िम्मेदारी पुलिस पर होती है। पुलिस जो कि राज्य सरकार अधिकार में आती है। पुलिस की ये भूमिका बहुत महत्वपूर्ण होती है। यही तय करती है कि अदालत में ये मामला कितना मज़बूत या कमज़ोर होगा।

गुजरात की भाजपा सरकार ने आज तक इस बात पर ध्यान नहीं दिया है कि क्यों राज्य में इतने कम आरोपियों को सज़ा मिल रही है। क्या गुजरात में महिलाओं के प्रति अपराध बहुत कम हो गए है? आकड़े तो ऐसा नहीं कहते।

तो जब पीएम मोदी पूरे देश में “बेटी पढ़ाओ बेटी बचाओं” का नारा दे रहे हैं तो 15 सालों तक गुजरात के मुख्यमंत्री रहते हुए उन्होंने इस समस्या पर ध्यान क्यों नहीं दिया। क्या गुजरात की भाजपा सरकार ये सब जानकार भी जानबूझकर अनजान है?

 

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