बिहार में हुई राजनीतिक उठापलट के बाद से ही मुख्यमंत्री नीतीश कुमार को बिहार के कई युवाओं ने खुले तौर पर ख़त लिखे है । जिसमे नीतीश कुमार के महागठबंधन को तोड़ BJP के साथ हाथ मिलाने को गलत कदम बताया गया , क्योंकि बिहार की जनता ने BJP की सोच के खिलाफ जाकर महागठबंधन को बड़ा बहुमत दिया था । लेकिन नितीश ने उस बहुमत को किनारे कर नंबर तीन की पार्टी BJP के साथ गठबंधन कर सरकार बना ली । पढ़िए ये खुला ख़त ..

प्रिय नीतीश जी,
आज बिहार में जो हो रहा है, उसमें जाति गाहे-बगाहे चर्चा के केंद्र में आ जाती है। मेरे एक शिक्षक ने टिप्पणी की कि अब कुर्मी पर कोई भरोसा नहीं करेगा। मैंने तुरंत विनम्रतापूर्वक कहा कि नीतीश और कुर्मी पर्यायवाची शब्द नहीं हैं। किसी एक शख़्स के ज़ाती कुकर्म के चलते उसकी पूरी जाति को कैसे बदनाम किया जा सकता है? हालांकि उन्होंने समाज के अंदर व्याप्त जातिवादी मानसिकता को लेकर आशंकित हो ऐसा कहा था। मतलब, कोई भी प्रगतिशील-धर्मनिरपेक्ष व्यक्ति, चाहे वो आपके सजातीय क्यों न हों, आपके इस क़दम को सही नहीं ठहरा रहे। बहरहाल, यहाँ दो वाक़ये का ज़िक्र करना चाहता हूँ।

भूपेन्द्र नारायण (बीएन) मंडल 1967 में संयुक्त सोशलिस्ट पार्टी के पार्लियामेंट्री बोर्ड के चेयरमैन थे। बिहार सहित देश के 9 राज्यों में जब पहली बार गैर कांग्रेसी सरकार का गठन हुआ, तो बीएन मंडल अड़ गए कि बिहार में जबतक स्पीकर के पद पर धनिकलाल मंडल को नहीं बिठाया जाएगा, हमारी पार्टी सरकार में शामिल नहीं होगी। उनकी सोच के पीछे था कि जब एक कुर्मी समाज का व्यक्ति सदन का संचालन करेगा, उनसे मुखातिब हो, उन्हें अध्यक्ष जी कहकर, उनकी इजाज़त से अभिजात्य वर्ग के लोग भी अपनी बात रखेंगे, तो असल में यहाँ से समानता के भाव व संघर्ष को बल मिलेगा।

दूसरा वाक़या है 77 का। कर्पूरी ठाकुर लोकसभा के सदस्य थे। उन्हें बिहार का मुख्यमंत्री बनाया गया। पार्टी उनके लिए विधानसभा सीट ढूंढ रही थी। फूलपरास से देवेन्द्र यादव ने अपनी सीट कर्पूरी जी के लिए छोड़ी। उपचुनाव हुए, कांग्रेस ने वहां से दिग्गज नेता जयपाल सिंह यादव को खड़ा कर दिया। बहुत-से यादव उस क्षेत्र में मुखिया बन चुके थे। जयपाल सिंह का समधियाना भी उधर ही था। कर्पूरी जी परेशान थे कि कहीं हार न जाएं।

मीटिंग हुई, सबने कर्पूरी जी को आश्वस्त किया कि नाहक परेशान न हों। आप किसी जातिविशेष के नहीं, हम सबके नेता हैं। जयपाल सिंह जब आए, तो लोगों ने उनकी अच्छे से आवभगत की, कुटुंबैती के नाते 51 पल्ला धोती उन्हें भेंटस्वरूप दिया। वोटिंग के बाद जब काउंटिंग शुरू हुई, तो बक्सा से जयपाल सिंह नदारद थे, लोग बाहर में गाने-बजाने लगे। इस पर वहां के मुखिया लोगों ने सबको रोका कि अभी कोई उधम नहीं मचायेगा। जब तक जयपाल सिंह की जमानत ज़ब्त नहीं हो जाएगी, तब तक ढोल-पीपहू का दौर शुरू नहीं होगा। जैसे ही अंतिम फ़ीगर आया, नगाड़े बजने लगे।

तो, समाज में सौहार्द ऐसे आता है, चुन-चुन कर नफ़रत व घृणा में आकंठ डूबकर एक जातिविशेष के हज़ारों लोगों को अपने कार्यकाल में काउंटर करवा देने व एक जातिविशेष के अपराधियों के आगे करबद्ध खड़े होने से समता स्थापित नहीं होती। मुन्ना शुक्ला, राजन तिवारी, आनंद मोहन, अनंत सिंह, सूरजभान सिंह, रंजीत डान, सुनील पांडेय, रणवीर सेना, आदि-इत्यादि समाज के किस वर्ग से आते हैं? क्या इनका उदय मीडियानिर्मित ‘जंगलराज’ के खात्मे के लिए हुआ था, या ये “पवित्र पापी” की भांति ‘सभ्य जंगली’ बन गये थे ? इनमें से अधिकांश आपके साथ रहे हैं और अमीरदास आयोग आपने ख़ुद भंग किया था।

एक जाति व क्षेत्र विशेष के लोगों को रेलवे में भर देने या बीडीओ-सीओ-दारोगा बना देने से या चुनाव से पहले अपने सजातीय लोगों या अपनी प्रिय एक ही जाति के लोगों को बड़ी संख्या में एसपी-डीएम तैनात कर देने से ही सूबा भ्रष्टाचारमुक्त नहीं हो जाएगा। कच्चे चिट्ठे तो बहुत हैं, पर कहब तs लग जाई धक से…

नीतीश जी, उसी खगड़िया में किसने आप पर रोड़े बरसाए, आक्रोशित शिक्षामित्रों की अगुवाई करने वाले पूर्व विधायक के पोते किस जाति से संबद्ध थे, और किसने जान बचाई, ज़रा याद कर लीजिएगा छवि चमकाने से गर फ़ुर्सत मिल जाए तो… आपने ख़ुद बयान दिया था कि रणवीर यादव नहीं होते, तो मेरी जान पर बन आई थी। इस पर लालू प्रसाद ने रणवीर जी की तारीफ़ करते हुए आप पर तंज भी किया था, “जब मुख्यमंत्री तक की जान रणवीर यादव ही बचाते हैं, सुरक्षा-व्यवस्था भी वही दुरुस्त करते हैं, तो अभयानंद को हटा के रणवीरे को डीजीपी बना दो”।

मार खाए खगड़िया में
रेस्ट करे अररिया में

उस वक़्त मैं इसका मतलब नहीं समझ पाता था, न कोई बताता था, इसलिए हाय मोरल ग्राउंड तो आप न ही लीजिए। बाक़ी, मुझ जैसे बहुतेरे युवा आपकी इज़्ज़त करते आये हैं, पर आपने ख़ुद ही सारे किए-धड़े पर न सिर्फ़ पानी फेर दिया, बल्कि जनता की संचित पूंजी को नाली में बहा दिया। इसी को कहते हैं – चूहे से घर को बचाने के लिए घर में आग लगा देना।

भवदीय,
जयन्त जिज्ञासु
04.08.17

साभार – जयन्त जिज्ञासु

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