आज 11 मई को मशहूर अफ़साना निगार सआदत हसन मंटो का जन्मदिन है। मंटो उर्दू अफ़साने का सबसे बड़ा चेहरा, साथ ही साथ फ़िल्म एवं रेडियो पटकथा का लेखक और पत्रकार भी थे। अपने छोटे से जीवनकाल के उन्होंने कई प्रसिद्ध रचनाएँ लिखीं जिसमें टोबाटेक सिंह, स्याह हाशिए, ठंडा गोश्त, काली सलवार जैसी दर्जनों रचनाएँ शामिल हैं।

मंटो का जन्म एक कश्मीरी मुस्लिम परिवार में 11 मई 1912 को लुधियाना के एक गावँ में हुआ था। चाचा नेहरु के नाम लिखे एक ख़त में उन्होंने कहा था कि कश्मीरी होने का दूसरा मतलब ख़ूबसूरत होना होता है। मंटो की पहली कहानी ‘तमाशा’ जालियाँ वाला बाग़ नरसंघार के ऊपर थी। 1934 में अलीगढ़ जाने के बाद वे प्रगतिशील लेखक संघ से जुड़ गए और वहाँ उनकी मुलाक़ात अली सरदार जाफ़री से हुई जिससे उनकी लेखनी में नया उछाल प्राप्त हुआ।

उनकी दूसरी कथा ‘इंक़लाब पसंद’ अलीगढ़ मैगजीन में मार्च 1935 में छपी। बँटवारे के वक़्त वे पाकिस्तान चले गए थे। रोज़गार के तौर पे मंटो ने कई अख़बार में काम किया, आल इंडिया रेडियो में भी काम किया। कहानियों में अश्लीलता के आरोप की वजह से मंटो को छह बार अदालत जाना पड़ा था, जिसमें से तीन बार पाकिस्तान बनने से पहले और बनने के बाद लेकिन एक भी बार मामला साबित नहीं हो पाया।

सआदत हसन मंटो का लेख आज भी ज़ौक़-ओ-शौक़ के साथ पढ़ा जाता है मंटो ने उर्दू अफ़साने को एक नई राह दिखाई थी। अपनी कहानी में उन्होंने विभाजन, दंगों और सांप्रदायिकता पर तीखे कटाक्ष किए। मर्दवादी सोच पर लगातार प्रहार करते रहे, उनकी लेखनी में महिलाओं का दुःख देखने को मिलता है।

मंटो लिखते हैं कि “ज़माने के जिस दौर से हम इस वक़्त गुज़र रहे हैं, अगर आप उससे नावाकिफ़ हैं तो मेरे अफ़साने पढ़िए। अगर आप इन अफ़सानों को बर्दाश्त नहीं कर सकते तो इसका मतलब है कि यह ज़माना नाक़ाबिले-बर्दाश्त है। मुझमें जो बुराईयां है, वो इस अहद की बुराईयां हैं”।

मंटो लिखते हैं कि “हिंदुस्तान आज़ाद हो गया था, पाकिस्तान आलम-ए-वजूद में आते ही आज़ाद हो गया था। लेकिन इंसान दोनों मुल्कों में ग़ुलाम था ता’अस्सुब का ग़ुलाम, मजहबी जुनून का ग़ुलाम। हैवानियत और बरबरियत का ग़ुलाम”।

18 जनवरी 1955 को मंटो का देहान्त हो गया था। उन्हें 14 अगस्त 2012 को मंटो को मरणोपरांत पाकिस्तान का सबसे बड़ा नागरिक सम्मान ‘निशान-ए-पाकिस्तान’ के अवार्ड से नवाजा गया। उनकी एक लघु कथा करामत: लूटा हुआ माल बरामद करने के लिए पुलिस ने छापे मारने शुरु किए। लोग डर के मारे लूटा हुआ माल रात के अंधेरे में बाहर फेंकने लगे,कुछ ऐसे भी थे जिन्होंने अपना माल भी मौक़ा पाकर अपने से अलहदा कर दिया, ताकि क़ानूनी गिरफ़्त से बचे रहें। एक आदमी को बहुत दिक़्कत पेश आई। उसके पास शक्कर की दो बोरियाँ थी जो उसने पंसारी की दूकान से लूटी थीं।

एक तो वह जूँ-तूँ रात के अंधेरे में पास वाले कुएँ में फेंक आया, लेकिन जब दूसरी उसमें डालने लगा ख़ुद भी साथ चला गया। शोर सुनकर लोग इकट्ठे हो गये। कुएँ में रस्सियाँ डाली गईं। जवान नीचे उतरे और उस आदमी को बाहर निकाल लिया गया। लेकिन वह चंद घंटो के बाद मर गया। दूसरे दिन जब लोगों ने इस्तेमाल के लिए उस कुएँ में से पानी निकाला तो वह मीठा था। रहे रात उस आदमी की क़ब्र पर दीए जल रहे थे।

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