राजस्थान उपचुनावों के नतीजों ने देश में कई तरह की राजनीतिक बहसों को बल दे दिया है। एक तरफ जहाँ इसे राजस्थान में कांग्रेस की वापसी के तौर पर देखा जा रहा है तो एक ओर इसे देश की राजनीति के स्तर पर देखा जा रहा है।

राजस्थान की दो लोकसभा और एक विधानसभा सीट के उपचुनावों में भाजपा हार गई है। कांग्रेस ने इन सभी सीटों पर बड़े अंतर के साथ जीत हासिल की है। राजस्थान में जो पार्टी सरकार में रही है वही उपचुनावों में जीत ती रही है। लेकिन इस बार राज्य की ये राजनीतिक परम्परा टूटी है।

राजस्थान में भाजपा की इस हार ने भाजपा की सांप्रदायिक राजनीति पर सवाल खड़ा कर दिया है। राजस्थान से पश्चिम बंगाल और गुजरात एक दूसरी ही कहानी कहते नज़र आते हैं।

राजस्थान में भाजपा उस समय हारी है जब राज्य का महौल साम्प्रदायिक रूप से बिगड़ा हुआ है। पिछले काफी समय से राज्य में लगातार गौरक्षा को लेकर अल्पसंख्यकों पर हमलें हो रहे हैं। हाल ही में राजस्थान में लव जिहाद के नाम पर अफराजुल नाम के एक मुस्लिम मज़दूर की हत्या कर दी गई। इस मामले के अभियुक्त शम्भू रेगर के समर्थन में भी कट्टर हिन्दू संगठनों के द्वारा यात्राएं निकाली गई। यहाँ तक की एक कोर्ट के ऊपर चढ़कर भगवा झंडा तक फहरा दिया गया।

राज्य सरकार भी इस तरह के मामलों में अप्रत्यक्ष तौर पर कट्टरपंथी संगठनों को समर्थन देती नज़र आ रही थी। गौरक्षा के नाम पर हत्या करने वाले अभियुक्तों को बरी करने से लेकर शम्भू रेगर के समर्थकों को कोर्ट परिसर में चढ़ने तक की छूट में ये समर्थन सभी को दिखाई दिया। उसके बाद भी भाजपा तीनों सीटों पर बड़े अंतर से हारी।

पश्चिम बंगाल में भी हुए उपचुनावों में दोनों सीटों पर टीएमसी जीती है। राज्य में पिछले काफी समय से माहौल गर्माया हुआ है। भाजपा ममता बेनर्जी को मुस्लिम समुदाय का हिमायती दिखाने की पूरी कोशिश कर रही है। उसके बाद भी “दीदी” ने उलुबेरिया जैसी सीट पर भी जीत हासिल की।

उलबेरिया 2014 से ही सांप्रदायिक राजनीति का गढ़ बना हुआ है। पिछले साल फरवरी में भी उलबेरिया के तेहट्टा शहर में सरस्वती पूजा को स्कूलों में न होने देने के फैसले के बाद क्षेत्र का माहौल गरमा गया था।

आरएसएस लगातार राज्य में हिंदुत्व को जगाने की कोशिश में लगा है। पिछले साल ही रामनवमी को आरएसएस ने राज्य में हिंदुत्व का नया प्रतीक बनाने की कोशिश की थी। बंगाल में हमेशा दुर्गा पूजा को ज़्यादा धूमधाम से मनाया जाता है। लेकिन पिछले साल आरएसएस ने रामनवमी पर बड़े कार्यक्रम का आयोजन किया। इस दौरान राज्य में उसके कार्यकर्ता हाथों में तलवार लिए ‘जय श्री राम’ के नारे लगाते नज़र आए।

राज्य में पिछले साल बदुरिया में भी दंगा हुआ। इस दौरान भी सोशल मीडिया पर भाजपा आईटी सेल ने कई माहौल गर्माने वाली झूठी ख़बरों को फैलाया। इस सबके बाद भी सोशल मीडिया के ट्रोल और रामनवमी की ये भीड़ भाजपा के मतदाता के रूप में नहीं बदल पाई।

अब आते हैं भाजपा की सबसे बड़ी हिंदुत्व लेबोरेटरी गुजरात की ओर जहाँ भाजपा जीत तो गई लेकिन प्रतिष्ठा नहीं बचा पाई। इस बात में कोई दो राय नहीं है कि राज्य में लगातार चौथी बार जीतना कोई छोठी उपलब्धि नहीं है। लेकिन 2002 दंगों के बाद गुजरात को जिस तरह कट्टर हिंदुत्ववादी राज्य के रूप में देखा जाता है और पूरे देश में जिस तरह का माहौल बना हुआ है उसके बाद भी भाजपा का बहुमत से 8 सीटें ही ज़्यादा लाना उसके लिए शुभ संकेत नहीं है।

ये हालत तब थी जब केंद्र सरकार का पूरा केबिनेट, भाजपा के नए हिंदुत्व चेहरे योगी आदित्यनाथ और खुद पीएम मोदी ने राज्य के चुनाव में खुद को पूरी तरह झोक रखा था। चुनाव के दौरान राम मंदिर से लेकर जनेऊ तक को उछाला गया। फिर भी चुनाव नतीजे वाले दिन भाजपा का पसीना छूट रहा था। वोट परसेंटेज की बात करे तो यहाँ भी भाजपा कांग्रेस से ज़्यादा आगे नहीं रही| कांग्रेस का वोट परसेंटेज 42% रहा और भाजपा का 49%।

इन तीनों राज्यों में ही भाजपा ने साम्प्रदायिकता को जमके बढ़ावा दिया और तीनों में ही उसे परिणाम उम्मीदों के विपरीत मिले। ये बताता है कि अभी भी देश में भाईचारा और इंसानियत ज़िन्दा है। साथ ही गुजरात चुनाव ने ये भी साबित कर दिया की अभी भी लोग जातिगत भेदभाव के लिए खड़े हैं। वो अपनी असमिता के लिए लड़ रहे हैं।

ये भाजपा के लिए ही नहीं बल्कि सभी राजनीतिक दलों के लिए एक सबक है। देश में लोग अभी इतने उदार तो नहीं हुए हैं कि धर्म की राजनीति बंद हो जाए लेकिन इतने वेहशी भी नहीं हुए हैं कि शहर से लेकर गाँव तक के लोगों से रोज़गार छीनकर, उद्योग से लेकर किसानी तक को बर्बाद करके केवल धर्म के नाम पर वोट बटोर लिए जाए।

-अदनान अली

 

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