आज के दौर में फिल्मों और टीवी सीरियल्स ने भले ही पेशवा शासन को भव्यता का प्रतीक बनाकर उसकी सामंती बुराइयाँ छुपा दिया हो, वर्ण विशेष के वर्चस्व की वजह से इतिहास भी ऐसा लिखा कि दलित महिला की स्थिति का यथार्थ सामने न आ सके। मगर तत्कालीन सामाजिक चिंतकों के नजरिए से देखें तो पेशवा समाज के स्याह पक्ष पर पड़ती है।

पेशवा राज में शूद्र और दलितों की स्थिति किसी काल्पनिक नरक की अवधारणा से भी ज्यादा भयंकर थी और उस असहनीय यातना घर की तरह थी जिसमें शूद्र और दलितों को एकदम पद दलित की स्थिति पर खड़ा कर दिया। जिसमें उनकी स्थिति पशुओं से भी खराब हो गई थी।

सावित्रीबाई फुले अपने काव्य के माध्यम से पेशवाराज के जुल्मों का वर्णन करते हुए बताती है कि पेशवाराज मे शूद्रों-अतिशूद्रों के साथ उच्च वर्ग की स्त्रियों के हालात भी इतने बदतर थे कि पेशवा के बुलाने पर उसी की ऊंच जाति का निर्लज्ज पति अपनी पत्नी को यह करते हुए कि “चलो हवेली, एक सुनहरा मौका आ खड़ा हुआ है’ कहकर रावबाजी पेशवा के यहां छोड़ आया करता था।

पेशवाराज के बाद अंग्रेजों के आगमन पर जब शूद्र और दलित वर्ग शिक्षा की ओर थोड़ा सा अग्रसर हुआ तो भट-ब्राह्मण लोग दलित और शूद्रों का मज़ाक बनाते थे।

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