आंबेडकर ने कहा था कि “तुम अपनी दीवारों पर जाकर लिख दो कि तुम्हें कल का शासक बनना है जिसे आते-जाते समय तुम्हें हमेशा याद रहे।” इसी कथन से प्रभावित होकर एक सामाजिक कार्यकर्ता और राजनेता ने ऐसा आन्दोलन चलाया कि ब्राह्मणवाद और जातिवाद खतरे में आ गया ।

एक साधारण कुर्मी किसान परिवार में जन्में रामस्वरूप वर्मा (२२अगस्त १९२३ -१९अगस्त १९९८ ) एक सामाजिक न्याय योद्धा,विचारक और कुशल राजनेता थे ।
उनके द्वारा स्थापित सामाजिक -सांस्कृतिक संस्था अर्जक संघ ने किसान -दस्तकार जातियों के बीच वैज्ञानिक -मानवतावादी नजरिया विकसित करने का प्रयास किया।

जातिवाद और हिंदुत्व के मामले पर अपने दौर के सबसे प्रसिद्ध समाजवादी राममनोहर लोहिया से थे अन्तर्विरोध ..
रामस्वरूप वर्मा का मनना था आरक्षण और अवसर नहीं ,इस वर्णवादी -जातिवादी व्यवस्था को खत्म करने की जरुरत है . स्वयं लोहिया की गाँधी में आस्था थी .गाँधी वर्णवाद को स्वीकृति देते थे . इसी सवाल पर आंबेडकर गाँधी से दूर हुए थे . लोहिया गान्धीवादी थे, वर्मा जी आंबेडकरवादी। लोहिया के आर्दश मर्यादा पुरषोत्तम राम और मोहन दास करमचन्द गान्धी थे, माननीय रामस्वरूप वर्मा के आदर्श बुद्ध, फूले, आंबेडकर और पेरियार थे। डा. आंबेडकर ने कहा था, “असमानता की भावना, ब्राह्मणवाद को उखाड़ फेकों, वेदों और शास्त्रों में डाइनामाइट लगा दो।” अर्जक संघ के संस्थापक माननीय रामस्वरूप वर्मा ने अर्जक संघ के कार्यकर्ताओं को निर्देश दिया कि पूरे देश में जहाँ जहाँ अर्जक संघ के कार्यकर्ता हैं वे बाबा साहब आंबेडकर के जन्म दिन को चेतना दिवस के रूप में मनाएं और मूल निवासी बहुजनों को जागरूक करने के लिए 14 अप्रैल 1978 से 30 अप्रैल तक पूरे महीने रामयण और मनुस्मृति का दहन करें। अर्जक संघ के कार्यकर्ताओं ने रामस्परूप वर्मा के आदेशों का पालन करते हुए रामायण और मनुस्मृति को घोषणा के साथ जलाया

रामस्वरूप वर्मा और जगदेव प्रसाद जैसे नेताओं ने गाँधीवादी लोहियावाद से विद्रोह किया और फुले -अम्बेडकरवाद के नजदीक आये . जीवन के आखिरी समय में कर्पूरी ठाकुर का भी गांधीवाद से मोहभंग हो गया था . वह भी फुले -अम्बेडकरवाद से जुड़ाव महसूस कर रहे थे . आनेवाली पीढ़ियां जब जागरूक होंगी ,इस राजनीतिक विकास का सम्यक अध्ययन प्रस्तुत करेंगी। जब शासक जातियों ने बाबा साहब द्वारा लिखित- जातिभेद का उच्छेद ओर धर्म परिवर्तन करें दोनो पुस्तकों को जब्त करने का आदेश जारी कर दिया तो शासनादेश के विरोध में रामस्वरूप वर्मा ने ललई सिंह यादव से हाईकोर्ट इलाहाबाद में याचिका दायर करवाया। ललई सिंह यादव ने विधिक लड़ाई जीतकर इलाहाबाद हाईकोर्ट से दोनों पुस्तकों को बहाल करवाया। इतना ही नहीं उन्होने उत्तर प्रदेश सरकार पर मानहानि का मुकदमा दायर कर उन्होनेे उत्तरप्रदेश सरकार से पूरे मुकदमें का हर्जा और खर्चा भी वसूल किया।
डा. लोहिया को हिन्दुत्व को खारिज किया जाये कतई बर्दाश्त नहीं था। इन्ही मुद्दों पर डा. लोहिया का वर्मा जी से भारी विवाद हुआ और यही विवाद डा. लोहिया की पार्टी से अलगाव का कारण बना।” वर्मा जी इस मुद्दे कितने सही थे, दूसरा बड़ा सबूत यही है लोहिया के रिश्ते तत्कालीन जनसंघ से बहुत गहरे हो गये थे। उनके हिन्दुत्व प्रेम का ही परिणाम था उन्होने जनसंघ प्रमुख दीनदयाल उपाध्याय के पक्ष में चुनाव प्रचार किया था और उनके महत्वपूर्ण साथी जार्ज फर्नांडीज जैसे लोग सीधे भारतीय जनता पार्टी में जुड़ गये थे। वर्मा जी ने नारा दिया था, ”मारेंगे, मर जायेंगे, हिन्दू नहीं कहलायेंगे।

(हिंदी क्षेत्र में साठ के दशक में समाजवादियों के बीच जाति और वर्ण के सवाल गहराने लगे थे। लोहिया के नेतृत्व वाली संयुक्त समाजवादी पार्टी अर्थात संसोपा के नारे ‘संसोपा ने बाँधी गांठ , पिछड़ा पावें सौ में साठ ‘ ने बड़े पैमाने पर पिछड़े वर्ग के राजनीतिक कार्यकर्ताओं को इससे जोड़ा था . लेकिन इनलोगों ने अनुभव किया कि संसोपा इसे लेकर गंभीर नहीं है।)
रामस्वरूप वर्मा का मानना था सामाजिक चेतना से ही सामाजिक परिवर्तन होगा और सामाजिक परिवर्तन के बगैर राजनैतिक परिवर्तन सम्भव नहीं। अगर येन केन प्रकारेेण राजनैतिक परिवर्तन हो भी गया तो वह ज्यादा दिनों तक टिकने वाला नहीं होगा
राम स्वरुप वर्मा  ने सामाजिक चेतना और जागृति पैदा करने के लिए 1 जून 1968 को सामाजिक संगठन ‘अर्जक संघ’ की स्थापना की। ,अर्जक संघ गांव गांव जाकर नुक्कड़ नाटक प्रस्तुत करता था जिसने ब्राह्मणवाद की चूलें हिला दी थीं। कांग्रेस ने अर्जक संघ पर प्रतिबन्ध लगा दिया था। उसके बाद गांवन में रत के अँधेरे में छिपकर नाटक होने लगे। अक्सर पुलिस और पीएसी आती थी पकड़ने के लिए। बहुत लोग गिरफ्तार हुए। धीरे धीरे कांग्रेस ने इसे ख़त्म कर दिया।
अर्जक संघ से ब्राह्मण कितना भयभीत हो गया था इसका अंदाज़ा इस बात से लगाया जा सकता है कि ब्राह्मणों ने नफरत से भरा हुआ नारा दिया था ”अर्जक संघी महा भंगी ” उनके अनुयायियों ने ही उत्तर प्रदेश विधान सभा में रामायण के पन्ने फाड़े। बाहर रामायण और मनुस्मति को जलाकर राख कर दिया।
वर्मा जी ने वित्त मंत्री रहते हुए भी कभी पद का दुरूपयोग नहीं किया ,व्यक्तिगत यात्रा वो रिक्शे पर करते थे परिवार का कोई दूसरा सदस्य सरकारी गाडी में नहीं बैठा कभी।

आज अर्जक संघ और शोषित समाज दल के संस्थापक महामना रामस्वरूप वर्मा जी का जन्मदिन है। कभी ईमानदारी से जब भारत का इतिहास लिखा जायेगा तो राम स्वरूप वर्मा जी का नाम सामाजिक आन्दोलनकर्ता और सामाजिक बदलाव लाने वाले सबसे महत्वपूर्ण लोगों में शुमार होगा।

ये लेख रजनीश संतोष की फेसबुक पोस्ट का कुछ अंश है ।

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