पहाड़ों में जितनी बर्फ नहीं गिरी है उससे कहीं ज़्यादा दिल्ली में सत्ता के गलियारों में बर्फ गिर रही है. दो दिनों से दिल्ली में बर्फ की सिल्ली गिर रही है मगर कोई इसके बारे में बात नहीं करना चाहता. एक ऐसी रिपोर्ट आई है जिसे लेकर पढ़ने वालों की सांसें जम जाती हैं, जो भी पढ़ता है अपना फोन बंद कर देता है कि कहीं कोई इस पर प्रतिक्रिया न मांग ले.

पत्रकार इस रिपोर्ट को छोड़कर बाकी सारी रिपोर्ट धुंआधार तरीके से ट्वीट कर रहे हैं ताकि बर्फ की इस सिल्ली पर जितनी जल्दी हो सके, धूल जम जाए. बहुत मुश्किल से निरंजन टाकले नाम के एक रिपोर्टर ने एक जज की लाश पर जमी धूल की परत हटा कर ये रिपोर्ट छापी है, बहुत आसानी से उस रिपोर्ट को यह दिल्ली बर्फ की सिल्ली के नीचे दबा देना चाहती है. मगर यह रिपोर्ट धीरे-धीरे व्हाट्स अप के तहखानों में बिना बताए एक जगह से दूसरी जगह पहुंच रही है. अंग्रेज़ी में छपी इस लंबी रिपोर्ट को पढ़ते ही पाठक डर के ऐसे अंधेरे कुएं में ख़ुद को गिरता हुआ महसूस करने लगता है, जहां उसकी चीख भी उसके पास नहीं पहुंच पाती है. हमने कई लोगों से प्रतिक्रिया के लिए पूछा, दोबारा जब फोन किया तो फोन बंद हो गया. सत्ता का डर सबको निहत्था कर देता है. क्या वाकई एक सीबीआई के जज की मौत से जुड़े सवालों से कहानी में इतने छेद हो जाते हैं कि आपको उस छेद के उस पार कोई हत्यारा ठहाके लगा रहा होता है, उसकी हंसी पहचानी लगती है मगर नाम ज़ुबान पर नहीं आता है.

इस रिपोर्ट का असर किसी रहस्यमयी थ्रिलर सा है जिसे पत्रकारिता के कोर्स में पढ़ाया जाना चाहिए. जो भी पांच लाख फीस देकर पत्रकारिता पढ़ रहे हैं उन्हें इस पर प्रोजेक्ट करना चाहिए. कई बार वाजिब कारणों से भी होता है कि दूसरे संस्थान की स्टोरी को हाथ लगाने से पहले इंतज़ार करते हैं. यह पूरी तरह से ठीक भी है मगर हैरानी की बात ये है कि दो दिनों तक छपने के बाद भी अदालतों के गलियारों से कोई आवाज़ सुनाई नहीं दी. मुमकिन है किसी ने पढ़ी न हो.

जजों के पास वक्त कहां होता है, अगर पढ़ी होती तो उन्हें क्या करना चाहिए था, क्या एक जज की मौत से जुड़े सवालों की फाइल दोबारा नहीं खुल सकती है. अदालत को, कानून मंत्री को, देश के कार्यकारी संरक्षक प्रधानमंत्री को क्या यह आश्वासन अपनी तरफ से नहीं देना चाहिए था. क्या विपक्ष को सवाल नहीं करना चाहिए था. क्या सबको यह आश्वासन नहीं देना चाहिए कि हम इस की जांच करेंगे वरना न्यायपालिका के भीतर के लोगों का अपने काम से भरोसा उठ जाएगा, वर्ना न्यायपालिका के बाहर के लोगों का भीतर बैठे लोगों पर भरोसा नहीं रहेगा.

पत्नी अपने पति और बेटा अपने पिता की मौत पर ख़ामोश हो गए. उनका डर वाजिब ही रहा होगा, मगर जस्टिस लोया की डॉक्टर बहन ने तीन साल बाद कहने की हिम्मत जुटा ली. लेकिन जब एक बहन ने बात कह दी, एक रिपोर्टर ने रिपोर्ट छाप दी, एक पत्रिका ने उसे लोगों तक पहुंचा दिया तो फिर दिल्ली में पत्रकारों और न्याय जगत के लोगों की ज़ुबान पर बर्फ़ की सिल्ली क्यों जम गई है. स्टोरी डरावनी तो है. मैंने इस स्टोरी को पढ़ने वाले पत्रकारों को डरते देखा है. मैं ख़ुद सिहर गया कि क्या एक जज की मौत वाकई मौत थी या किसी ने हत्या कर दी.

नागपुर में 1 दिसंबर 2014 की सुबह जज बृजगोपाल लोया की मौत दिल का दौरा पड़ने से बताई जाती है. तीन साल बाद उनकी बहन के सवाल हड्डियों में छेद कर देते हैं, लगता है कि उनकी किसी ने हत्या कर दी और हत्यारा आराम से टीवी देख रहा है. उसने कैरवां की स्टोरी चुपके से पढ़ी तो होगी. मुमकिन है इस स्टोरी पर पर्दा डालने के लिए दिल्ली में हिन्दू मुस्लिम मुद्दों की आंधी चल जाए, ऐसे मसले आ जाएं जहां टीवी पर मौलाना और एंकरों के बीच जंग छिड़ जाए लेकिन जब भी आंधी थमती है वो स्टोरी झलकने लगती है. पत्रकारिता का एक दायित्व यह भी है जब सारे लोग किसी स्टोरी को मरा हुआ छोड़ कर चले जाएं तो बहुत दिनों बाद वहां लौटा जाए और देखा जाए कि वहां कुछ और सुराग तो नहीं था.

आप निरंजन टाकले की इस स्टोरी को caravanmagazine.com पर पढ़ सकते हैं. अंग्रेज़ी में है और लंबी भी है. कैरवां के बाद इसे scroll.in और the wire.in ने भी छापा है. हिन्दी में आप the wirehindi.com, mediavigil.com पर इस स्टोरी को पढ़ सकते हैं. indiasamvad.co.in ने भी इस स्टोरी में एक नया एंगल जोड़ा है. कन्नड अखबार वार्ताभारती और मलयालम में छपने वाला अख़बार माध्यमम ने इस रिपोर्ट को कवर किया है. दिल्ली के अख़बारों के दफ्तर में ओस पड़ गए हैं.

कैरवान की इस स्टोरी की जांच हमने अपने स्तर पर नहीं की मगर जब सीबीआई के जज बृजगोपाल लोया की बहन का वीडियो बयान देखा तो लगा कि कम से कम जैसी स्टोरी है उसे उस रूप में बताया जा सकता है. सीबीआई के स्पेशल कोर्ट के जज बृजगोपाल लोया सोहराबुद्दीन एनकाउंटर मामले की सुनवाई कर रहे थे, जिस मामले में बीजेपी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह मुख्य आरोपी थे. 30 दिसंबर 2014 को सीबीआई के स्पेशल सीबीआई जज एमबी गोसावी अमित शाह को इस आरोप से बरी कर देते हैं. सीबीआई ने इस फैसले के ख़िलाफ़ ऊपरी अदालत में अपील नहीं की. अपील करने का इरादा है भी या नहीं, कौन पूछेगा. जब लोग एक छपी हुई स्टोरी से डर जाते है वहां कौन पूछेगा कि अपील क्यों नहीं की जा रही है.

6 जून 2014 को स्पेशल जज उत्पट नाराज़गी ज़ाहिर करते हैं कि अमित शाह क्यों नहीं आए. जज उत्पट आदेश देते हैं कि अमित शाह 20 जून को कोर्ट में हाज़िर हों, नहीं आते हैं. जज उत्पट अगली सुनवाई की तारीख़ 26 जून तय करते हैं मगर 25 जून को उनका तबादला हो जाता है. सुप्रीम कोर्ट का आदेश है कि सोहराबुद्दीन मामले में एक ही अधिकारी शुरू से अंत तक जांच और सुनवाई में रहेगा. जज उत्पट का तबादला पुणे हो जाता है. उनकी जगह आते हैं 48 साल जज बृजगोपाल हरिकिशन लोया. जज लोया अमित शाह को निजी तौर पर हाज़िर होने की शर्त से छूट दे देते हैं. कहते हैं कि वे दस हज़ार पेज की चार्जशीट को फिर से देखना चाहते थे, नए जज थे इसलिए और केस संवेदनशील था इसलिए भी. उनके साथ रहने वाली भांजी नुपूर ने बताया है कि इस केस को लेकर बहुत तनाव है. इसे कैसे समझा जाए, इसमें बहुत लोग शामिल हैं. इससे कैसे निपटा जाए.

भांजी ने यह बात कैरवां के रिपोर्टर निरंजन टाकले को बताई. उसी के बाद से निरंजन ने इस कहानी की पड़ताल शुरू कर दी. 31 अक्तूबर को जज लोया ने पूछा कि अमित शाह हाज़िर क्यों नहीं हैं. शाह के वकील कहते हैं कि उन्होंने खुद हाज़िर ना होने की छूट दी है. लोया याद दिलाते हैं कि छूट तब था जब शाह राज्य के बाहर हों, उस दिन शाह मुम्बई में थे. 1 दिसंबर 2014 की सुबह नागपुर में जस्टिस लोया की मौत होती है. 15 दिसंबर 2014 को जज लोया के सामने अमित शाह की पेशी होनी थी. 30 दिसंबर को नए जज एमजी गोसावी अमित शाह को सभी आरोपों से बरी कर देते हैं.

फैसले में कहा जाता है कि राजनीतिक कारणों से अमित शाह को फंसाया गया था. जज की मौत वाली स्टोरी में अमित शाह का ज़िक्र सिर्फ संदर्भ की बात है, बताने के लिए वे कितने हाई प्रोफाइल मामले की सुनवाई कर रहे थे, इसका मतलब यह नहीं कि किसी पर इशारा किया जा रहा है, वो हम बिल्कुल नहीं कर रहे मगर इसी एक कारण से यह भी लगता है कि जज लोया की मौत से जुड़े सवालों को गंभीरता से लेना चाहिए ताकि किसी को शक न हो. आखिर उनकी बहन को बताना तो पड़ेगा कि उनके सवालों का क्या हुआ. जज लोया नागपुर नहीं जाना चाहते थे. वहां एक जज की बेटी की शादी में जाना था मगर दो जज कहते हैं कि चलना चाहिए. उनके कहने पर वे नागपुर जाते हैं. शादी से लौट कर मुंबई में अपनी पत्नी से बात करते हैं और उसके बाद उनके परिवार को कुछ पता नहीं चलता. सुबह एक फोन आता है कि जज लोया मर गए हैं. निरंजन टाकले ने जज लोया की डॉक्टर बहन के हवाले से जो सवाल और घटना लिखा है अब आप उसे पढ़कर और सुनकर सिहर जाएंगे. किसी की मौत दिल का दौरा पड़ने से हो सकती है मगर एक जज की मौत होगी उसके पोस्टमार्टम से लेकर लाश को पत्नी और बेटे के घर भेजने की जगह बाप के पास गांव भेजने का फैसला कोई और कर लेगा, यह सब सवाल इतनी आसानी से हजम नहीं होते हैं. एक जज का मामूली बातों के लिए प्रोटोकाल होता है.

उनकी बहन ने जो बात बताई है उनके अनुसार परिवार का फैसला नहीं था कि नागपुर से लोया की लाश मुंबई जाएगी या उनके गांव. बस परिवार के सदस्यों को फोन आता है कि उनकी लाश लातूर के गेटगांव भेजी जा रही है. गेटगांव में लोया के पिता रहते हैं, लोया की तीन बहनें धुले, जलगांव और औरंगाबाद में रहती हैं. आख़िर किससे पूछ कर जस्टिस लोया की लाश मुंबई की जगह गेटगांव भेजी जाती है. यही नहीं लाश के साथ कोई सुरक्षा नहीं थी, कोई पुलिस वाला नहीं था, कोई प्रोटोकोल नहीं था. एबुंलेंस का ड्राईवर अकेले उस लाश को गेटगांव लेकर उतरता है. जिन दो जजों के साथ जज लोया गए थे, वे डेढ़ महीने तक परिवार से संपर्क नहीं करते हैं. वे जज भी अपने सहयोगी की लाश के साथ गेटगांव नहीं आते हैं.

यह वीडियो हमें कैरवां पत्रिका ने दी है. मराठी में जज लोया की बहन अनुराधा बियानी बोल रही हैं जिनसे लोया काफी बात करते थे, मामूली बातों के लिए दवा पूछते थे. इसलिए बहन को पता था कि भाई को किस तरह की तकलीफ है. पोस्टमार्टम रिपोर्ट में दिल का दौरा पड़ने के जो कारण बताए गए हैं, उससे डॉक्टर बहन सहमत नहीं हैं. उन कारणों का उनके परिवार में कोई हिस्ट्री नहीं है. बहन की आदत है डायरी लिखने की. वे हर दिन की बातचीत लिखती रहती थीं. उस बातचीत से पता चला कि उन्हें मौत की सूचना कथित तौर पर आरएसएस के कार्यकर्ता ईश्वर बहेती से मिलती है. कैरवां पत्रिका के रिपोर्टर ने ईश्वर बहेती से सवाल किया है मगर जवाब नहीं आया है. यही बहेती है जो कुछ दिनों बाद अनुराधा बयानी के घर जस्टिस लोया का फोन लेकर आता है. अनुराधा के मन में सवाल दौड़ने लगता है कि जज का फोन एक ईश्वर बहेती को कैसे मिला.

जज की मौत होगी, तो उनके सामानों की ज़ब्ती होगी और कायदे से पुलिस ही लेकर आएगी.
यही नहीं अनुराधा की एक और बहन सरिता मंधाने के पास किसी जज का फोन आता है. सरिता उस दिन लातूर में थी. भाई की मौत की खबर मिलते ही लातूर के एक अस्तपाल में भर्ती अपने भतीजे को लेने जाती हैं. लेकिन वहां वही ईश्वर बहेती मिलता है जो फोन लेकर अनुराधा के घर गया था. सरिता ने ध्यान तो नहीं दिया मगर यह सवाल धंस गया कि ये ईश्वर बहेती कौन है जो भाई की मौत की खबर लेकर आता है. बहेती उन्हें कहता है कि नागपुर जाने की ज़रूरत नहीं है. वहां से लाश एंबुलेंस के ज़रिए गेटगांव भेजी जा चुकी है. बहेती उन्हें घर लेकर जाता है. बहनों को बहुत बात में ध्यान आता है एक जज की मौत हुई है, न पुलिस न प्रशासन. आरएसएस का एक आदमी इतना सब कुछ कैसे जानता है.

जब लोया का अंतिम संस्कार होता है तब कई जज शामिल होते हैं. वहां कुछ जज पत्नी और बेटे को किसी से बात करने से मना करते हैं. दोनों आजतक बोलने की हिम्मत नहीं जुटा पाए, मैं समझ सकता हूं, आपको भी समझना चाहिए. बस इतना ही कहना है कि ऐसा भी क्या जीना कि इतना डरना चाहिए. दिल्ली में हरतोष बल, अपूर्वानंद, शबनम हाशमी, मनीषा सेठी और सईदा हमीद ने प्रेस कांफ्रेंस की और पूरी बात बताई. यहां मीडिया के कैमरे और रिपोर्टर तो मौजूद नज़र आ रहे हैं, उम्मीद है आपको 23 नवंबर के अख़बारों में इस ख़बर के बारे में पढ़ने को मिलेगा. मुमकिन है कि मीडिया हिन्दू मुस्लिम का कोई नेशनल सिलेबस लेकर इतना हंगामा करेगा कि ये ख़बर दब जाएगी जैसे किसी जज की मौत की ख़बर तीन साल तक दबी रहती है. यही खूबी भी है कि जब सब लोग इस स्टोरी पर बोलने से कतरा रहे हैं तीन चार लोग प्रेस कांफ्रेंस कर रहे हैं और एक रिपोर्टर निरंजन टाकले भी आता है तो यह स्टोरी कर देता है. हमारे सहयोगी उमाशंकर सिंह इस प्रेस कांफ्रेंस को कवर करने गए थे.

मौत को लेकर सवाल ही तो है, ज़ाहिर है जांच होने में किसी को क्या दिक्कत है, बोलने में इतना डर क्यों हैं, क्या हम डर को गले लगाने लगे हैं, यह किसी के लिए अच्छा नहीं है. डर बांटना बंद कीजिए, किसी पर शक भी करना बंद कीजिए लेकिन जब कोई सवाल कर दे तो सरकार और अदालत का काम है कि जवाब का आश्वासन दे और जवाब भी दे. बहन अनुराधा बियानी की बातों और अपनी जांच के आधार पर निरंजन टाकले ने मौत की रात से जुड़े जो डिटेल जुटाए हैं, वो डराने वाले हैं. जज लोया नागपुर के वीआईपी गेस्टहाउस रवि भवन में ठहरे थे. जहां उस वक्त कई जज, कई बड़े अधिकारी भी ठहरे थे. जब सीने में दर्द की शिकायत होती है तो उन्हें ऑटो से ले जाया जाता है. क्या उस गेस्ट हाउस में एक भी गाड़ी नहीं थी, ऑटो रिक्शा से कैसे ले जाया गया. रवि भवन से दो किमी की दूरी पर ऑटो रिक्शा स्टैंड हैं. लोया को एक ऐसे अस्पताल में ले जाया जाता है जहां ईसीजी मशीन काम नहीं कर रही थी. वहां से उन्हें दूसरे अस्पताल में ले जाया जाता है. जहां उन्हें मृत घोषित कर दिया जाता है. यह भी पता नहीं चल पाया है कि जस्टिस लोया को अस्पताल लेकर कौन गया. वीआईपी गेस्ट हाउस से एक जज को ऑटो में बिठाकर कौन ले गया था.

जब मौत हुई थी तब मीडिया में ख़बर छपी थी, दिल का दौरा पड़ने से मौत की खबर को सबने सामान्य तौर पर लिया. किसी को शक भी नहीं हुआ. मगर अनुराधा बियानी और निरंजन टाकले अपनी पड़ताल से कुछ ऐसे सवाल निकालते हैं जो पहली नज़र में देखने पर वाकई पत्थर से भी ज़्यादा ठोस लगते हैं. पोस्टमार्टम के हर पन्ने पर एक व्यक्ति के दस्तखत है. दस्तख़त के नीचे लिखा है कि यह लोया का चचेरा भाई है. अनुराधा बियानी कहती हैं कि उनका कोई चचेरा भाई नहीं है. रिकॉर्ड के अनुसार लोया का शव इसे सौंपा जाता है. मगर एंबुलेंस में लाश लेकर तो सिर्फ ड्राइवर गया था. वह आदमी कौन था और कहां है इस वक्त जिसका दस्तख़त है.

रिपोर्ट बहुत लंबी है और डरावनी है. अगर एक जज की मौत से जुड़े सवाल अधूरे रह सकते हैं तो हम किस व्यवस्था में जी रहे हैं. कैरवां ने एक और रिपोर्ट छापी है, इस रिपोर्ट के बाद. जिसमें बताया है कि एक जज को इस केस को निपटाने के लिए सौ करोड़ के रिश्वत की कथित रूप से पेशकश हुई थी. इसका ज़िक्र यहां नहीं क्योंकि जज की मौत से जुड़े सवाल अभी ख़त्म नहीं हुए हैं. आप समझ गए होंगे कि क्यों दिल्ली पर बर्फ की सिल्ली पड़ी है. क्या एक जज की मौत की जांच से लेकर पोस्टरमार्ट रिपोर्ट तक में इतने अंतर हो सकते हैं, सुनंदा पुष्कर की पोस्टमार्टम रिपोर्ट तो रोज़ टीवी पर खुलती है, खुलनी भी चाहिए मगर जस्टिस लोया के परिवार वालों को क्या जवाब मिलेगा. नागपुर के सीतावदी पुलिस स्टेशन और सरकारी मेडिकल कॉलेज के दो सूत्रों ने निरंजन टाकले को बताया कि उन्होंने आधी रात को ही शव देख लिया था, उसका पोस्टमार्टम भी उसी वक्त कर लिया गया था. मगर पोस्टमार्टम रिपोर्ट में मृत्यु की सूचना का वक्त सवा छह बजे है. पोस्टमार्टम शुरू होता है 10 बजकर 55 मिनट पर और ख़त्म होता है 11 बजकर 55 मिनट पर. जाहिर मौत का समय और पोस्टमार्ट के समय को लेकर दो तरह की राय है.

क्या इस रिपोर्ट को यूं ही अनदेखा कर दिया जाना चाहिए, किसके हित में इन सवालों को अनदेखा करना, एक जज की मौत होती है, उनका बेटा और पत्नी बोलने का साहस नहीं जुटा पाते तो क्या भारत के प्रमुख न्यायाधीश को उन्हें सुरक्षा का भरोसा नहीं देना चाहिए, उन्हें बोलने का हौसला नहीं देना चाहिए. आखिर जब एक नागरिक डर के कारण जीने का, बोलने का हौसला छोड़ देगा तो कौन हौसला देगा. क्या सत्ता को हमने डर का चादर बना लिया है कि वो डराती रहेगी और हम उस डर की चादर को तान कर सोते रहेंगे, उसके नीचे डर से कांपते रहेंगे, सवाल सिम्पल है, जज तमाम तरह के मामलों की सुनवाई करते हैं. बहुत मुश्किल है कहना कि किसी की हत्या का संबंध किस मामले से थे मगर क्या यह जानना ज़रूरी नहीं कि एक जज की मौत को लेकर सवाल उठ रहे हैं, उसके जवाब कब और कैसे मिलेंगे. अगर इस स्टोरी के संदर्भ से किसी को डर है तो क्या बिना संदर्भ के परवाह किए सिर्फ जज की मौत से जुड़े सवालों का जवाब नही खोजा सकता है. एक आम नागरिक के लिए भी जवाब ज़रूरी है. वरना सबको लगेगा कि जब एक जज के साथ ऐसा हो सकता है तो फिर किसी के साथ हो सकता है. मैं भी आपसे एक बात कहना चाहता हूं. मुझे भी डर लगा था, लेकिन इसलिए इसे किया ताकि अनुराधा बियानी को ये न लगे कि उसके भाई को किसी ने मार दिया और बोलने वाला कोई नहीं था. लोया के बेटे को ये न लगे कि इस देश में कोई किसी के लिए बोलता नहीं है. ऐसा नहीं है. मुझे उम्मीद है कोई बोले न बोले, प्रधानमंत्री और भारत के मुख्य न्यायधीश ज़रूर बोलेंगे कि डरने की बात नहीं है. जो सवाल हैं उनकी जांच होगी।

लेखक- एनडीटीवी पत्रकार रवीश कुमार

साभार- NDTV प्राइम टाइम

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