Thursday, Feb 23, 2017
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20 लाख लोग बेरोजगार हो गए, क्या नोटबंदी का समर्थन करने वाले इन बातों को झुठला सकते हैं- रवीश कुमार

आज के इंडियन एक्सप्रेस के पहले पन्ने की चर्चा करना चाहता हूं। अक्सर इस अख़बार की कई ख़बरों में,उनकी प्रस्तुति में पत्रकारिता के बुनियादी श्रम की झलक मिलती है। मैं सर्वोत्तम कहने का अधिकार नहीं रखता मगर फिर भी यह अख़बार अपनी सीमाओं में एक पाठक की बुनियादी ज़रूरतों को पूरी करता है। इसकी ख़बरों को लेकर भी किस्से होते ही होंगे। आप भीतर के पन्नों को देखें, प्रस्तुति का सौंदर्यबोध देखें और फिर उन हिन्दी अख़बारों से तुलना करें तो आपको फर्क पता चलेगा। यह भी गिन सकते हैं कि किसी एक हिन्दी के अख़बार के तमाम संस्करणों में कितने संपादक और विशेष संवाददाता काम करते हैं और एक्सप्रेस में कितने हैं। तब आपको और पता चलेगा कि किस अख़बार की ख़बरों में पत्रकारिता का श्रम और साहस है। कोलकाता से छपने वाला अंग्रेज़ी अख़बार टेलिग्राफ का पहला पन्ना भी चंद अतिरेकों को छोड़कर शानदार होने लगा है।

आप सभी को वाकई इस सवाल पर सोचना चाहिए कि आप किसी अख़बार को क्यों वर्षों से पढ़े चले जा रहे हैं। कभी-कभी दूसरी भाषा के अख़बारों से तुलना भी कीजिए जैसे आप चैनलों के बारे में करते हैं। अंग्रेज़ी और हिन्दी अख़बारों के संपादकीय पन्नों का भी तुलनात्मक अध्ययन कीजिए। दोनों के विषय क्या है, दिशा क्या है और पोलिटिक्स क्या है। पाठक बनने के लिए मेहनत करनी पड़ती है वरना पाठक जी ही रह जाएंगे। बहुत सारे युवा हम जैसों का चेहरा देखकर पत्रकारिता संस्थानों के घटिया शिक्षकों की सोहबत में अपनी जवानी बर्बाद कर रहे हैं। वो तीन चार अखबारों को लेकर रोज़ाना फेसबुक पर तुलनात्मक रिपोर्ट डाल सकते हैं। इससे पत्रकारिता को लेकर उन्हीं की समझ बढ़ेंगी। बाकी करनी तो नौकरी ही है, पत्रकारिता कोई नहीं चाहता। ऐसा नहीं है कि हिन्दी के पत्रकारों में जुनून नहीं है मगर दफ्तरों का शिकंजा कस चुका है। ज़ाहिर है अब पाठक ही ख़ुद को बदल सकते हैं।

एक्सप्रेस की पहली ख़बर है कि साढ़े चौदह लाख करोड़ पुराने नोट बैंकों में वापस आ चुके हैं। अब सिर्फ 75,000 करोड़ पुराने नोट सिस्टम से बाहर हैं। पी वैद्यनाथन अय्यर लिखते रिज़र्व बैंक के अधिकारियों से बात कर सूत्रों के हवाले से लिखते हैं कि नोटबंदी के दिन साढ़े सत्रह लाख मुद्रा चलन में थी। इस मुद्रा का अट्ठासी फीसदी 500 और 1000 के नोट थे यानी साढ़े पंद्रह लाख करोड़। अभी तक 93 फीसदी पुराने नोट वापस आ चुके हैं। रिज़र्व बैंक के पास 60 बड़ी बड़ी मशीनें हैं जिनसे अब जाली नोटों का पता लगाया जा रहा है। ये मशीनें हर दिन 12 घंटे काम करेंगी तब भी पूरे नोटों से जाली नोट छांटने में 600 दिन लग जायेंगे। यह कितनी रोचक जानकारी है। क्या यह सरकार विरोधी पत्रकारिता है या पत्रकारिता का मूल काम है। इससे एक जवाब मिलता है कि नोटबंदी से कितने जाली नोट तबाह हुए उसका पता लगने में दो साल लग जायेंगे! क्या यही बात प्रधानमंत्री नहीं बोल सकते कि उनका पता लगाया जा रहा है और इस काम में वक्त लगेगा।

नोटबंदी के समय कहा गया था कि जो काला धन होगा वो बैंकों में नहीं आएगा। जो नहीं आएगा वो नष्ट मान लिया जाएगा और यह सरकार के खाते में लाभ माना जाएगा। इसके अलग अलग अनुमान छपे हैं। अय्यर लिखते हैं कि तीन लाख करोड़ काला धन नष्ट होने की उम्मीद थी। मगर 93 फीसदी पैसा वापस होने के बाद यह उम्मीद जाती रही है। अब सिर्फ 75,000 करोड़ का हिसाब मिलना बाकी है। एक अच्छी खबर है कि रिजर्व बैंक के अनुसार दस लाख करोड़ के नए नोट चलन में आ चुके हैं। दो सवा दो लाख करोड़ और नए नोटों की सप्लाई से स्थिति और भी सामान्य हो जाएगी। लेकिन जब सारा पैसा सिस्टम में आ गया तो तो नोटबंदी का क्या लाभ हुआ। यही न कि लोग घरों में नगदी रखते थे उसे सरकार ने बैंकों में रखने के लिए लोगों को मजबूर किया।

इसलिए सरकार नोटबंदी से जुड़े इस बुनियादी सवाल का जवाब नहीं दे रही है। वो नारों की बात कर रही है। काला धन मिट जाने की बात कर रही है। कैशलेस की बात कर रही है। मगर नोटबंदी से कितना काला धन मिटा इसकी बात नहीं कर रही है।
जनता के समर्थन का भूत दिखाकर सवालों को किनारे लगाया जा रहा है। अब जैसे मैंने ही दंगल की समीक्षा लिखी और दंगल सुपर डूपर हिट हो गई तो क्या वो समीक्षा बेकार मानी जाएगी। क्या हर सवाल का यही पैमाना होना चाहिए कि कितना वोट मिला। फिर तो आपातकाल भी सही है, सिख दंगा भी सही है, मुज़फ्फरनगर दंगा भी सही है, गुजरात दंगे भी सही हैं क्योंकि इन सबके बाद कोई न कोई दल जीतता तो रहा ही है। जो राजनीतिक दल नोटबंदी का समर्थन करने के लिए लालायित हैं वो भी इन सवालों को पूछे बग़ैर घोषणा करने जा रहे हैं कि नोटबंदी से जनता खुश है। ग़रीबी दूर होने वाली है।

एक्सप्रेस की एक और ख़बर है। इसके तहत मनरेगा के तहत दिसंबर महीने में पिछले कई महीने की तुलना में रोज़ काम मांगने वाले मज़दूरों में 60 प्रतिशत की वृद्धि देखी गई है। अख़बार के अनुसार मनरेगा की मॉनिटरिंग करने वाले अधिकारियों का मानना है कि नोटबंदी के कारण कई लोगों का काम छूट गया है। गांव लौट कर ये मज़दूर मनरेगा के तहत काम मांग रहे हैं। जुलाई और नवंबर 2016 के बीच हर दिन औसतन 30 लाख मज़दूर मनरेगा के तहत काम मांगने आते थे। अकेले दिसंबर में यह संख्या बढ़कर 50 लाख हो गई।

यानी नोटबंदी का समर्थन कर रहे राजनीतिक दलों को इस बात की कोई चिंता नहीं कि 20 लाख लोगों का काम छिन गया। जनता के समर्थन के नाम पर ये भीतरी चालाकी की तैयारी हो रही है। क्या नोटबंदी का समर्थन करने वाले इन बातों को झुठला सकते हैं। क्या इसकी बात करना भ्रष्टाचार का समर्थन करना है? एक्सप्रेस के अनुसार सात जनवरी को 83 लाख 60 हज़ार मज़दूर मनरेगा के तहत काम मांगने आए। इस संख्या को लेकर तो बवाल मच जाना चाहिए। 53 लाख मज़दूर गांव लौटे हैं या उनका आस पास के कारखानों में काम गया है। दिहाड़ी मज़दूरी छिनी है। ये गांव छोड़कर क्यों गए थे? क्योंकि इन्हें कहीं मनरेगा से ज़्यादा मज़दूरी मिल रही थी। अब यही मज़दूर पहले से कम कमा रहे हैं।

एक्सप्रेस में एक और खबर छपी है। आल इंडिया मैन्यूफैक्चरर्स आग्रेनाइज़ेशन (AIMO)ने एक अध्ययन किया है। इसके अनुसार नोटबंदी के पहले 34 दिनों में सूक्ष्म व लघु उद्योगों में 35 फीसदी नौकरियां चली गईं। उनके राजस्व में 50 फीसदी की कमी आ गई। इस संस्था का मानना है कि मार्च 2017 से पहले रोज़गार में 60 फीसदी की गिरावट आएगी और राजस्व में 55 फीसदी की कमी आएगी। यानी अभी और नौकरियां जाने वाली हैं। जब स्थिति सामान्य हो रही है तो नौकरियां क्यों जा रही हैं? यह संस्था सूक्ष्म, लघु, मध्यम और बड़े उद्योगों की तीन लाख इकाइयों का प्रतिनिधित्व करती है। काश कि यह संख्या प्रतिशत की जगह यह बताती कि कितने लाख मज़दूरों की नौकरी गई है। काश हिन्दी अखबारों के तमाम संस्करणों के सैंकड़ों पत्रकार गांव घरों में जाकर बताते कि वे किस हालात में जी रहे हैं। सरकार से जब भी ये सब सवाल होते हैं वो जवाब नहीं देती है। कुछ और कहती है। नारे लगा देती है। यही सुनने को मिल रहा है कि जनता ने हमारा साथ दिया है। बेशक जनता ने साथ दिया है लेकिन क्या उस जनता को इन सवालों के जवाब जानने के हक नहीं है। जनता तो हमेशा ही काले धन के खिलाफ है। तब भी थी जब ढाई साल से काले धन के खिलाफ कुछ नहीं हुआ। जब माल्या भाग रहा था। ललित मोदी सबको ठेंगा दिखा रहा था। चुनावों में बेतहाशा पैसे खर्च हो रहे थे। वैसे नोटबंदी के कारण पत्रकार भी नौकरियां गंवाने के लिए तैयार रहें। शुरूआत हो ही चुकी है।

क्या लाखों लोगों की नौकरियां जाना,लोगों का शहरों से गांवों की तरफ लौट कर कम मज़दूरी पर काम करना ये सब कारण नहीं हैं कि सरकार से सीधा सवाल पूछा जाए। विपक्ष भी नारे लगा कर भाग जाता है। कई तरह के विपक्ष हैं। विपक्ष का एक हिस्सा नोटबंदी के नाम पर नई राजनीतिक गोलबंदी करने का मौका खोज रहा है। आप भी देखिये कि वो समीक्षा करते वक्त इन सब सवालों पर क्या जवाब मांगता है। जवाब मांगने की जगह खुद ही निष्कर्ष निकालता है या पूछकर समीक्षा करता है। यही कहेंगे कि तमाम पालिकाओं में बीजेपी जीत रही है, यूपी जीत रही है तो जनता इसके साथ है। बीजेपी तो पहले भी जीत रही थी। बिना नोटबंदी के लोकसभा जीत गई तो क्या उसके जीतने से सारे सवाल गौण हो गए।

क्या इस तरह की खबरें आपको हिन्दी अखबारों में पढ़ने के लिए मिल रही हैं? आप क्यों इन अख़बारों को पढ़ रहे हैं? चैनलों का हाल तो और भी बुरा है। उनके भीतर न तो ऐसे मसलों की रिपोर्टिंग के लिए काबिल लोग हैं न उनकी दिलचस्पी। आप भी स्पीड न्यूज़ को पत्रकारिता समझने लगे हैं। सूचनाविहीन एंकर प्रवक्ताओं के साथ वॉलीबॉल खेल रहा होता है। आप समझते हैं कि रात को नौ बजे जागरूक हो रहे हैं।

 

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