अगर आज तेज बहादुर यादव अकेला पड़ गया तो कल हर हिंदुस्तानी अपनी जंग अकेले ही लड़ेगा।

देश को खूब बुरा लगा जब हमारे फौजी जवान कुछ कश्मीरी अलगाववादियों से मार खाते एक वीडियो में दिखे। बुरा लगना उचित भी था और स्वाभाविक भी। पर कल जब देश के हुक्मरानों के हाथों, देश के फ़ौजी मार खा गए तो देश ने चुप्पी क्यों साध ली? सिपाही तेज़ बहादुर यादव ने सिस्टम से मुँह की खाई तो हमें बुरा क्यों नहीं लगा?

तेज बहादुर यादव ने किसके लिए इतना बड़ा खतरा मोल लिया? सिर्फ अपनी थाली के लिए? या सिर्फ़ सहकर्मी फ़ौजी भाइयों के हक़ लिए? या पूरे देश की आत्मा, उसके स्वाभिमान के लिए?

तेज बहादुर यादव ने किसके दम पर यह आवाज़ बुलन्द की थी? हमारे दम पर, देश की आवाम के दम पर, देश के ज़ुल्म ना सहने के, अक्सर सुनी जाने वाली, संकल्प के दम पर। सोचा होगा, हम ज़िंदा कौम हैं। अन्याय के विरुद्ध आवाज़ उठाएंगे। वह आवाज़ उठाएँगे कि हक़मारी करने वाले सहम जाएँगे।

पर कल जब तेज बहादुर यादव को बर्खास्त कर दिया गया, तो क्या हमें बुरा लगा? हम तो उस मुद्दे से थक चुके थे। मीडिया की भाँति उससे हट दूसरे मुद्दे, दूसरे ब्रेकिंग न्यूज़ पर आ चुके थे। कुछ वीडियो को ही नकली, तो तेज बहादुर को ही काँग्रेस का एजेंट, विपक्ष की चाल या मोदी जी को बदनाम करने की साज़िश मान चुके थे।

सचमुच वो दूसरी मिट्टी से ही बने भारतीय रहे होंगे जो बर्बर, क्रूर अंग्रेज़ों से ही भिड़ गए। हम तो अपने रक्षकों को ही इंसाफ़ दिलवाने के लिए अपने अफसरों और सिस्टम से भी लोहा नहीं लेना चाहते।

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