आजकल मानहानि का दैत्य किसी का भी पीछा कर सकता है। इस समय जितनी जरुरत ठंड से बचने की है उतनी ही मानहानि से बचने की भी है। वास्तव में किसी तीसरे व्यक्ति की नज़र में जब किसी पर कीचड़ उछाला जाता है तो मानहानि होती है। एक आम आदमी की मानहानि अक्सर सड़क पर चलते हुए भी हो जाती है जब बगल से निकलने वाली कार उस पर कीचड़ उछाल कर रफूचक्कर हो जाती है। बड़े-बड़े लोग तो करोड़ों के मानहानि के केस दाग देते हैं लेकिन बेचारा आम आदमी खड़ा-खड़ा सोचता रह जाता है कि वह इल्जाम कार ड्राइवर पर लगाए या ऊबड़ खाबड़ सड़क पर ।

मानहानि से भी बड़ी समस्या सामानहानि की है। सफ़र के दौरान अगर कोई ठंडी हवा के झोकों के साथ एक नींद लेना चाहे तो उसे डर होता है कि कोई उसका सामान लेकर ही चम्पत न हो जाए। हाल ही में स्पाइस जेट के विमान में एक यात्री का सामान चोरी हो गया। काफी जद्दोजेहद के बाद उसे साठ हजार का हर्जाना दिया गया। जब विमान से सामान गायब हो जाता है तो ट्रेन का क्या भरोसा किया जाए। अजी यहां तो इंसान का ही भरोसा नहीं है कि कब गायब हो जाए सामान बेचारा तो फिर भी निर्जीव ठहरा।

पिछले दिनों लखनऊ से दिल्ली के सफ़र के दौरान रात में कोई मेरा भी बैग लेकर नौ दो ग्यारह हो गया। एक तरफ दुख था कि सामान चला गया और दूसरी तरफ खुशी थी कि थोड़ा बोझ कम हो गया। पद्मश्री गोपालदास नीरज ने कहा है ”जितना कम सामान रहेगा, सफ़र उतना आसान रहेगा।” कितना भी कम सामान लेकर चलें लेकिन एक दो जोड़ी कपड़े तो रखने ही पड़ते हैं और अगर वो भी कोई ले उड़े तो इंसान को नंगई करनी पड़ती है। अक्सर रेलवे स्टेशन पर अनाउंस होता है कि अपने सामान की हिफाज़त स्वयं करें। इस विषय पर हम पहले से ही गम्भीर होते हैं क्योंकि यहां की सुरक्षा व्यवस्था पर हमें पूरा भरोसा है कि वह समय पर कभी काम नहीं आएगी। यह परिस्थिति हमें आत्मनिर्भर बनाती है। फिर भी सामानहानि की समस्या गम्भीर है। इसके लिए भी सख्त कानून बनाने की जरूरत है जिससे अपने साथ सामान की भी सुरक्षा सुनुश्चित की जा सके।

-अंकित ओझा

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