Thursday, Jan 19, 2017
HomeArticleक्या आप भी ओवैसी के विरोध या समर्थन वाले ऑनलाइन ट्रोल से परेशान हैं? यदि हां, तो इसे पढ़ें- अनस

क्या आप भी ओवैसी के विरोध या समर्थन वाले ऑनलाइन ट्रोल से परेशान हैं? यदि हां, तो इसे पढ़ें- अनस

आज कल एक ओवैसी समर्थक के कमेंट्स का स्क्रीनशॉट कुछ लोग शेयर करके ओवैसी और उनकी राजनीतिक विचारधारा को लताड़ते हुए मिल जाते हैं।

वह प्रोफाइल किसी ज़ैदी उपनाम वाले शख्स की है। आप सबको याद होगा मैंने कुछ दिनों पहले एक ऐसी ही प्रोफाइल का ज़िक्र किया था कि किस तरह वह विषयांतर टिप्पणियां ओवैसी के समर्थन में करने का प्रयास करता दिखता है परंतु उन टिप्पणियों में हमेशा सामने वाले का वैचारिक विरोध घटिया शब्दों में होता है।

मैंने उसे तभी ब्लॉक कर दिया था जब उसे बने हुए मुश्किल से दस मिनट हुए होंगे। लेकिन मैं देख रहा हूं कि ओवैसी विरोधी और ओवैसी समर्थक उस ज़ैदी उपनाम की प्रोफाइल से आई टिप्पणियों का स्क्रीनशॉट उठा कर दिन भर चकल्लस करते फिरते हैं। इनमें से किसी को नहीं पता कि वह ज़ैदी है कौन?

ज़ैदी को आज मैंने अनब्लॉक किया और सोचा प्रोफाइल विज़िट की जाए। वॉल पर उसके कुछ नहीं था। ओवैसी की फोटो लगा रखी है। काम है सिर्फ कमेंट करना। वो भी उनके वॉल पर जो ओवैसी के धुर विरोधी हैं। फिर ओवैसी के धुर विरोधी लोगों का काम है ओवैसी और उनकी राजनीतिक पक्षधरिता की आलोचना करने का।

कई बार इस तरह की प्रोफाइल लोग सिर्फ इसलिए बनाते हैं ताकि उनका अस्तित्व बना रहे। आजकल ओवैसी की तरफ से ऐसा कोई बयान नहीं आ रहा है जिसका विरोध वगैरह किया जाए। ऑनलाइन लफंगों की आपसी लड़ाईयों जो कि खासकर अल्पसंख्यक समुदाय के युवाओं तक सीमित हो चली है के लिए फॉलोवर्स के बीच बने रहने के लिए यह सब हथकंडे अपनाए जाने लगे हैं।

ओवैसी के तथाकथित समर्थकों की भाषा निसंदेह गलत है परंतु हाल ही में यह देखा गया है कि ओवैसी विरोध का झंडा उठाने वाले तथाकथित प्रगतिशील मुसलमानों का एक धड़ा बेहद छिछली भाषा के साथ सामने आया है। मैं ऑनलाइन ट्रोल्स पर तभी ध्यान देता हूं जबकि सामने वाला अपनी पहचान के साथ आए, बिना पहचान वाली प्रोफाइल से आने वाली गालियों अथवा आलोचना को मैं इग्नोर करता हूं।

वजह यह कि पता नहीं कौन किस मकसद से ऐसा कर रहा हो। ओवैसी के तथाकथित समर्थकों के बारे में मेरी यही राय है कि जब तक सामने वाले की पहचान घोषित न हो तब तक उसका लोड नहीं लेना चाहिए, यदि आप ऐसा कर रहे हैं तो कहीं न कहीं आपका इरादा, सुधार के बजाए बिगाड़ और अपनी कुंठा शांत करने का है।

हाल ही में आई एक किताब ‘ I Am A Troll ‘ की लेखिका स्वाति चतुर्वेदी ने सवाल उठाया है कि भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ऑनलाइन ट्रोल को क्यों फॉलो करते हैं। मोदी अपने पर्सनल ट्विटर अकाउंट से बीजेपी के ऑनलाइन लफंगों को फॉलो करते हैं जिन पर आरोप लगता रहा है कि वे लोग आमिर खान, बरखा दत्त, रवीश कुमार, राजदीर सरदेसाई समेत अन्य कलाकारों तथा पत्रकारों को लेकर ऑनलाइन हेट कैम्पेन चलाते हैं।

यूपीए शासनकाल एवं नेहरू गाँधी परिवार को बदनाम करने वाले झूठे तथा मक्कार ऑनलाइन लफंगों को मोदी आज भी फॉलो करते हैं। एक पीएम द्वारा किसी को फॉलो करना बहुत बड़ी बात होती है। पीएम अपने समकक्ष किसी दूसरे राष्ट्र के राजनेता, खुद के मंत्रियों तथा देश के अन्य राजनेताओं, बेहतरीन डॉक्टरों, समाजसेवकों, कलाकारों, बुद्धिजीवियों के बजाए ऑनलाइन ट्रोलिंग करने वालों को फॉलो कर रहा है इसका मतलब है कि वह लफंगई को अपना समर्थन दे रहा है। इसलिए सोशल मीडिया पर मोदी के पक्ष में उतरने वालों को मोदीभक्त कहा जाने लगा।

ठीक इसी तरह से अरविंद केजरीवाल के पास एक अच्छी टीम है जो उनका तथा पार्टी का सोशल मीडिया चलाया करती है। वहीं दूसरी तरफ दक्षिणपंथी मुस्लिम राजनीति करने का दावा रखने वाले राजनैतिक दल एआईएमआईएम के पास न तो ताकतवर ऑनलाइन ट्रोलिंग का कोई सिस्टम दिखता है न तो समूह बनाकर ट्रेंड में आने का कोई रिकॉर्ड रहा है, जो लोग भी समर्थन में लिखते हैं वे सब के सब स्वैच्छिक है। स्वेच्छा से वे गाली देते हैं, गाली खाते हैं और फिर सो जाते हैं। फिर जागते हैं और फिर गाली गलौच शुरू हो जाती है। इन ऑनलाइन समाज सेवकों का विरोध भी बिल्कुल इसी अंदाज़ में होता है। दोनों एक दूसरे को उकसाते हैं। वे उसे चिकोटी काटेगा, ये उसे काट खाएंगे।

क्या आपके आसपास ये सब हो रहा है? यदि हो रहा है तो कृप्या करके इससे दूर रह कर अख़बार का संपादकीय पढ़ें, ऑनलाइन न्यूज़-व्यूज़ वेबसाइट्स पढ़ें। यहां वक्त खपाने से कुछ नहीं होगा। क्योंकि कुछ लोग रोजगार तो कुछ और कर रहे हैं परंतु वक्त ऑनलाइन ट्रोलिंग का कर रहे हैं और आपको भिड़ा देना चाहते हैं इस ऑनलाइन ट्रोलिंग के बाज़ार में। जहां न तो आप खरीददार हैं न तो दुकानदार। अंत में हाथ कुछ नहीं आएगा। पछतावा होगा। दूर रहें ऐसे विमर्श तथा विवाद से जो सिर्फ फेसबुक तक सीमित रहे।

लेखक-

मोहम्मद अनस, सोशल मीडिया विश्लेषक। अनस राजीव गांधी फाउंडेशन में बतौर रिसर्च असोसिएट तथा ज़ी मीडिया में एक्जक्यूटिव के तौर पर काम कर चुके हैं। सोशल मीडिया पर अपनी बेबाक लेखनी के लिए प्रसिद्ध हैं।

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1 COMMENT
  • iftekhar alam / January 3, 2017

    बहुत अच्छा

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