पिछले तीन सालों से देश में सबसे ज्यादा क्षति हुई है तो वह सांप्रदायिक सौहार्द और हिंदू-मुस्लिम भाईचारे को।

अर्थव्यवस्था तो लड़खड़ाई ही है, राजनीति तो स्तर खो ही रही है मगर समाज का सबसे बड़ा नुकसान आपसी प्रेम और भाईचारे में घुलता हुआ संप्रदायिक ज़हर है।

सहिष्णुता तो इस कदर खत्म हो रही है कि महज शक और संदेह के आधार पर लोगों की हत्या कर दी जाती है । अफवाहों पर भीड़ जुटाई जा रही है और जान लेने के बाद भी तरह तरह की सफाई दी जा रही है।

मई 2014 में मोदी सरकार के बनने से लेकर अब तक तीन सालों में भीड़ द्वारा की जा रही हत्याएं लगातार बढ़ती जा रही हैं । इन्हें कुछ दुर्भाग्यपूर्ण घटनाएं कहकर टाला नहीं जा सकता क्योंकि कोई एक-दो घटना नहीं हैं।

सिलसिलेवार हो रही सुनियोजित घटनाओं से एक बात तो साफ है कि भीड़ की हिंसा स्टेट स्पॉन्सर्ड है यानि सरकार की शह पर ही ऐसी घटनाओं को अंजाम दिया जा रहा है । नहीं तो मजाल क्या है कि मारने-पीटने और जान लेने का वीडियो बनाकर सोशल मीडिया पर पोस्ट करते हुए अपराधी गर्व महसूस करे और बाद में खुद को हीरो की तरह पेश करने की हिम्मत भी करे।

सरकार से सांठ-गाँठ के आरोप बेतुके नहीं हैं  बल्कि इन बड़ी घटनाओं की बाकायदा रिपोर्टिंग हुई है , गवाह और साक्ष्य मौजूद हैं।
कांग्रेस प्रवक्ता रणदीप सुरजेवाला ने अपने ट्विटर अकाउंट से ऐसी जानकारी साझा की है जिसके जरिए पता लगाया जा सकता है कि देश भर में किस तरह से इन घटनाओं को अंजाम दिया जा रहा है। इन घटनाओं का विवरण देने वाले तमाम न्यूज़ वेबसाइट जैसे कि द हिंदू ,इंडियन एक्सप्रेस , बीबीसी और हिंदुस्तान टाइम्स के लिंक अटैच्ड है। साथ ही पीड़ितों और गवाहों का पक्ष रखने के लिए बोलता हिंदुस्तान की टीम ने व्यक्तिगत रूप से लोगों से बात करते हुए उनकी वेदना को समझने की कोशिश की है।

तीन साल पहले  केंद्र में नई सरकार बनने के कुछ ही दिन बाद जिस तरह से गुड़गांव में मांस व्यापारियों को मारा पीटा गया और गांव छोड़कर भागने पर मजबूर किया गया उससे  गौ रक्षा  के नाम पर गुंडई की आधिकारिक शुरुआत हो गई। फिर तो घटनाएं गुजरात ,मध्य प्रदेश और दिल्ली तक बढ़ती ही गईं । लेकिन इन सब में सबसे ज्यादा चर्चित घटना रही दिल्ली से कुछ ही दूरी पर स्थित दादरी में अखलाक की हत्या महज़ इस शक पर कर देना कि उसके घर में रखा गया मांस बीफ है ।मंदिर के लाउडस्पीकर से उड़ाई हुई अफवाह  के बाद भीड़ ने ना सिर्फ एक इंसान की हत्या की बल्कि इंसानियत का कत्ल किया था । इस घटना के बारे में हमने अखलाक के भाई से बात किया तो वह आरोप से सीधा इनकार करते हुए कहते हैं ‘बीफ़ तो छोड़िए किसी भी तरह का मांस या नॉन-वेज हमारे घर में था ही नहीं । जिस बीफ़ की कहानियां गढ़ी जा रही हैं ,मांस के जिन टुकड़ों को खुद ही कहीं गांव में रखकर उठाया गया है ,उनका हमारे परिवार से कोई लेना देना नहीं था । हमने तो अपने भाई को उस उन्मादी भीड़ के हाथों खो दिया जिसका उन्होंने कभी कुछ भी नहीं बिगाड़ा था।’

घर में मांस था या नहीं, वह मांस बीफ़ था या नहीं, ये अलग बात है लेकिन जिस तरह से भीड़ इकट्ठा होकर अखलाक की हत्या कर बैठी, वो भयावह था।

अगर तत्कालीन राज्य सरकार और केंद्र में बैठी मोदी सरकार इस मामले पर गंभीरता और संवेदनशीलता दिखाते हुए अपराधियों को ऐसी सजा देती कि देश भर में संदेश चला जाता ‘देश नियम- कानून और संविधान के हिसाब से चलेगा ,भीड़ की नफरत और उन्माद से नहीं ।’

लेकिन हत्यारी भीड़ के साथ खड़ी होकर के भाजपा सरकार ने अपनी मंशा जता दी कि उसका इरादा क्या है । अखलाक की हत्या करने वालों को गले लगाकर मोदी के केंद्रीय मंत्री महेश शर्मा ने ऐसी मिसाल पेश किया कि देशभर के अराजक तत्वों को यह संदेश मिल गया  ‘नफरत की राजनीति में ही सामाजिक और राजनैतिक प्रमोशन मिलने वाला है।’फिर तो घटनाएं बढ़ती गई और मध्य प्रदेश ,राजस्थान, झारखंड तक फैलती हुई देशव्यापी हो गई ।

मार्च 2016 में झारखंड के दो पशु व्यापारियों को गौरक्षकों ने पेड़ से लटका दिया । इसमें पांच गोरक्षकों को गिरफ्तार भी किया गया था।

जुलाई 2016 में गुजरात के ऊना में चार दलित युवकों की जिस तरह से बर्बरता से पिटाई हुई और उसका वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल किया गया उससे आक्रोशित होकर लाखों दलित सड़कों पर आ गए । एक बड़े आंदोलन का रुप देखते हुए घबराया हुआ संघ गुजरात में अपनी जमीन तलाशने के लिए सर्वे करता है तो पाता है कि भाजपा का सिंहासन डगमगाने लगा है । देश का ‘चौकीदार’ तब तक चुप रहता है जब तक कुर्सी पर खतरा नहीं आता है । लेकिन जब संघ की इंटरनल रिपोर्ट आती है कि गुजरात में पाटीदार और दलितों की नाराजगी से आपका गृह राज्य ही हमारे हाथ से निकल जा रहा है तब नरेंद्र मोदी कहते हैं ‘गोली मारना है तो मेरे सीने पर मारो,मेरे दलित भाइयों पर जुल्म ना करो।’

हालांकि ये सबको पता होता है यह महज राजनीतिक बयान था, डैमेज कंट्रोल की थोड़ी बहुत कोशिश थी । लेकिन इस घटना के बाद गुजरात में चले दलित आंदोलन में जिस तरह से वहां का दलित संगठित हुआ और युवा नेता जिग्नेश मेवानी के नेतृत्व में मोदी सरकार के खिलाफ खड़ा हुआ, वो अभी तक अपने उसी इरादे पर अटल है।

लोगों की नाराजगी और दलित- मुस्लिम चेतना के बावजूद भी यह घटनाएं रुकी नहीं । फिर तो चाहे मध्य प्रदेश में बीफ़ के अफवाह पर महिलाओं पर हमला हो या फिर आंध्र में दलितों को नग्न करके पिटाई।

हरियाणा में जिस तरह से बीफ़ खाने का आरोप लगाकर एक 20 वर्षीय महिला और उसके 14 वर्षीय बहन के साथ बलात्कार किया गया और दो रिश्तेदारों की हत्या की गई ,इससे तो साफ हो गया कि गौरक्षा के नाम पर घिनौनेपन की हद पार की जा रही है । 12 सितंबर 2016 को बीबीसी की रिपोर्ट में जिस तरह से पीड़िता का दर्द साझा किया गया वो सराहनीय है , भले ही हमारी घरेलू मीडिया को ये कोई बड़ी घटना नहीं लगी।

युवाओं के लिए एक नई उम्मीद बनकर प्रधानमंत्री की गद्दी संभालने वाले मोदी के पिछले जन्म दिवस यानी 17 सितंबर 2016 को खुद को मोदी-दूत बताने वाले गौरक्षकों ने अहमदाबाद में एक युवक की पीट-पीटकर हत्या कर दी। सुनहरे भविष्य का सपना दिखाकर सत्ता में आए मोदी ने युवाओं को ऐसा हिंसक माहौल दिया है।

JNU में नया एडमिशन लेकर आया हुआ एक मुस्लिम छात्र नजीब अहमद संघ के छात्र संगठन द्वारा घेरा और मारा जाता है । दर्जनों की भीड़ हॉस्टल में घुसकर उसे मारती -पीटती है और उसके बाद अक्टूबर 2016 से उसे गायब कर दिया जाता है। शिनाख्त के लिए पुलिस आनाकानी कर रही है और उसकी तलाश में उसकी मां और उसकी बहन आज भी अपनी लड़ाई जारी रखे हुए हैं ,इस उम्मीद में कि उनका नजीब कहीं पर सही सलामत और सुरक्षित मिल जाए।

घटना को याद करते हुए नजीब की अम्मी रो पड़ती हैं और कहती है ‘क्या कसूर था मेरे बेटे का ? वह कभी लड़ाई झगड़े में तो पड़ा ही नहीं, पढ़ने-लिखने वाला सीधा-सादा छात्र, जिसकी आज तक किसी से तू-तू , मैं-मैं भी नहीं हुई , उसे ABVP वाले घेरकर मारते पीटते हैं और फिर गायब कर देते हैं । मेरे बेटे की शिनाख्त में ना पुलिस प्रशासन मदद कर रही है और ना ही ये सरकार।’

इस साल अप्रैल में दूध का व्यापार करने वाले 5 लोगों पर जिस तरह से भीड़ ने हमला किया और पिटाई की, उससे पशु पालने और व्यापार करने वाले मुस्लिमों में एक डर बैठ गया है।

पिटाई के बाद पहलू खान की मौत हो जाती है और साथियों को मारकर बुरी तरह से घायल कर दिया जाता है । उनके पड़ोसी युवक अजमत खान अपना दर्द साझा करते हुए हमसे कहते हैं ‘हम तो हमेशा से गाय-भैंस को दूध के लिए पाला करते थे ,पहलू खान तो उस गाय को अपनी बहन के लिए उपहार देने जा रहे थे कि रमजान के महीने में बच्चों को दूध पर्याप्त मात्रा में मिलता रहे । हम गौ-हत्यारे नहीं हैं ,हम तो पशुपालक हैं, हम किसान हैं। अब इस तरह के हमले के बाद कौन मुसलमान हिम्मत करेगा कि गाय को एक जगह से दूसरी जगह ले जाए,पाले, और दूध का व्यापार करे। मुझे मारा गया, पीटा गया, सहमा हुआ हूं ,डरा हुआ हूं लेकिन मजबूर हूं मैं अपने घर का एक और एकमात्र कमाने लायक सदस्य हूं। इस डर में ,इस नफ़रत भरे माहौल में भी मुझे अपने घर की रोजी रोटी चलानी है -जो रोजगार अभी तक पशुओं के व्यापार पर टिका था अब वह पूरी तरह से अधर में है ।’

आगे कहते हैं ‘मेरा भाई दिव्यांग है ,मेरी यह जिम्मेदारी है कि मुसीबतें कितनी भी आएं कमाने के लिए कुछ करना ही होगा। अभी हाल ही में तो मौत अपने सामने देखा हूं, फिर भी जिंदगी तो चलते रहने का नाम है ।’
ऐसा कहते हुए आंसुओं से भर आई अपनी आंखों को पोंछते हुए अजमत एक उम्मीद की बात करते हैं ‘कल फिर से नफरत और हिंसा के बादल छटेंगे और आपसी प्रेम बढ़ेगा।’

इस साल तो मानो पूरे देश में एक ट्रेंड बन गया है, अफवाहों के आधार पर हत्या करने की ठान ली गई है ।लगने लगा है कि भीड़ के मुंह में खून लग गया है, अब वह किसी को नहीं बख्शने वाली ।

पिछले महीने राजस्थान में शौच करती महिलाओं की फोटो लेने से मना करने पर सामाजिक कार्यकर्ता जफर की हत्या कर दी जाती है , जिसमें सरकारी अधिकारियों का हाथ होता है ।

इसके बाद कश्मीर में मस्जिद के सामने मोहम्मद अयूब पंडित को मार मार कर उनकी हत्या कर दी जाती है। उस भीड़ में भी एक नफ़रत होती है कि पुलिस वाला है ,सरकार का आदमी है।

इस दौरान सबसे ज्यादा दिल दहलाने वाली घटना दिल्ली और हरियाणा बॉर्डर पर चलती ट्रेन में हुई । जब चलती ट्रेन में, दर्जनों लोगों के बीच एक 16 वर्षीय युवक जुनैद की हत्या कर दी जाती है और हवाला देने के लिए एक ही बात काफी थी – ये मुसलमान है। भीड़ ने मान लिया कि मुसलमान है तो बीफ़ खाता है , पाकिस्तानी है ।

एक मासूम की इस तरह से हत्या के खिलाफ पूरा देश उबल पड़ा और अपने गुस्से का इजहार करने के अलग-अलग माध्यम ढूंढ़ने लगा। तभी खबर आती है कि पश्चिम बंगाल में गाय चोरी का आरोप लगाकर तीन लोगों की हत्या कर दी गई ,फिर खबर आती है कि झारखंड में मरी हुई गाय को लेकर एक मुस्लिम की हत्या करने की कोशिश की जाती है और उसका घर जला दिया जाता है ।

इसके बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी गुजरात में गांधी को याद करते हुए अपील करते हैं कि ‘यह गांधी का देश है । यहां इस तरह की हिंसा नहीं चलेगी ।’ 
ठीक उसी समय गौरक्षकों ने कार से उतारकर एक व्यक्ति की हत्या महज इस शक के आधार पर कर दिया कि उस गाड़ी में प्रतिबंधित मांस (बीफ) है ।

इसमें कोई शक नहीं कि ये उन्मादी लोग अपना रोल मॉडल किसे मानते हैं । और एक तरफ उनका सबसे बड़ा नेता अगर कह रहा है कि इस तरह की हिंसा नहीं बर्दाश्त की जाएगी, दूसरी तरफ वो इस तरह की हिंसा तुरंत ही कर रहे हैं , इससे साफ हो जाता है की आपस में समझदारी है । वह जानते हैं कि मंच पर क्या बोलना है और सड़क पर क्या करना है ।

हत्यारी भीड़ का भाजपा ,संघ और कट्टर हिंदुत्व दक्षिणपंथ से कनेक्शन होना कोई झूठा आरोप नहीं है बल्कि लगभग सभी घटनाओं में इनकी भागीदारी कभी न कभी खुलकर आ ही जाती है । अभी हाल ही में हुई झारखंड की घटना के 2 दिन बाद पुलिस भाजपा के जिला मीडिया प्रभारी को इस हत्या से जुड़े केस में गिरफ्तार किया गया है।

इन तमाम घटनाओं में एक बात कॉमन है -अफवाहों के आधार पर भीड़ का हिंसक हो जाना। यानि कि जिसके पास अफवाहों को फैलाने का प्रचारतंत्र है, उसका पलड़ा भारी रहेगा । इस हिसाब से सोशल मीडिया से लेकर मेनस्ट्रीम मीडिया को अपने एजेंडे का प्रचार तंत्र बनाने वाली भाजपा बढ़त बनाए हुए है।  और आगे भी उसकी कोशिश है कि घटनाएं इतनी ज्यादा हों कि यह लोगों को आम बात लगने लगे।

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