मोदी सरकार के लिए न्यायपालिका से उठे तमाम सवाल अब काफी कठिन हो गए हैं। सुप्रीम कोर्ट के चार जजों ने चीफ जस्टिस पर आरोप लगाए हैं।

क्योंकि चीफ जस्टिस कहीं ना कहीं सरकार के दवाब में आकर काम कर रहे हैं। न्याय में निष्पक्ष भूमिका निभाने वाले जजों को साइड किया जा रहा है।

ऐसी बातों से नाराज जजों ने इतिहास में पहली बार प्रेस कांफ्रेंस की। इस प्रेस कांफ्रेंस को काफी गहरे नजरिए से देखा जा रहा है। इसके तमाम मतलब निकाले जा रहे हैं। वरिष्ठ वकीलों ने जजों के इस कदम की तारीफ की है।

लेकिन अब सवाल केंद्र नीत मोदी सरकार पर उठ रहे हैं। जिन जजों ने न्यायालय की कार्यप्रणाली पर तमाम सवाल उठाए हैं। उनमें से एक सवाल जस्टिस लोया की संदिग्ध मौत पर भी उठ रहे हैं।

सुप्रीम कोर्ट से तमाम लोग निष्पक्ष जांच की मांग की उम्मीद रख रहे हैं। जस्टिस लोया की मौत पर उठ रहे सवालों के घेरे में भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह हैं।

इसलिए जांच में फेरबदल और निष्पक्ष ना होने के चांस बढ़ रहे हैं। इसी बात से सुप्रीम कोर्ट के चार जज काफी नाराज थे।

अब सवाल न्यायपालिका और सरकार की मंशा पर उठ रहे हैं। आम लोगों को न्याय की उम्मीद न्यायपालिका से होती है लेकिन जब न्यायपालिका ही न्याय नहीं करेगी तो न्याय व्यवस्था पर सवाल उठने लगेंगे। सरकार और स्वतंत्र न्याय व्यवस्था का गठजोड़ काफी घातक हो सकता है।

सोशल मीडिया पर तमाम लोगों ने न्यायपालिका के साथ चुनाव आयोग पर भी सवाल खड़े कर दिए।

एक यूजर ने लिखा कि, जब न्यायपालिका का हाल ये है तो सोचिए चुनाव आयोग का हाल क्या होगा ?

दरअसल काफी समय से चुनाव की विश्वसनीयता पर सवाल उठ रहे हैं। ईवीएम में तमाम जगहों पर गड़बड़ी पाई गई हैं। जहां जहां गड़बड़ी निकली है वहां भाजपा के पक्ष में वोट जाते पाए गए हैँ।

तमाम विपक्षी दलों ने ईवीएम गड़बड़ी का आरोप लगाया है। लेकिन चुनाव आयोग कोई कार्यवाही नहीं करता है।

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