कल का दिन बिहार विधानमंडल में एक काले दिन के रूप में दर्ज हो गया। भाजपा के एक विधानपार्षद(MLC) और उपाध्यक्ष लाल बाबू प्रसाद गुप्ता ने बीजेपी के विधायक की पत्नी और उन्ही के घटक दल की महिला विधानपार्षद को सरेआम सारी मर्यादाओं को तार-तार करते हुए सदन के अंदर छेड़ दिया, गलत तरीके से छुआ और अभद्र टिप्पणी की। पर भाजपा के तथाकथित सबसे बड़े स्वयंभू, प्रधानमंत्री मोदी जी के स्वजातीय ‘भद्र’ और ‘माननीय’ सुशील मोदी पूरे मुद्दे पर ही पर्दा डाल रहे हैं।

माननीय महिला विधान पार्षद के पति भी भाजपा के ही विधायक है, जो उस समय बिहार विधानसभा में उपस्थित थे। पीड़ित माननीया ने जब आपबीती को अपने पति को बताया तो विधायक जी ने विधान परिषद में जाकर भाजपा के ‘माननीय’ विधान पार्षद की लात घूसे बरसा कर सरेआम कुटाई कर दी। जिस मारपीट को बिहार भर से आए माननीयों ने अपनी आँखों से देखा, उसे भाजपा के नेता बड़ी बेशर्मी से नकार रहे हैं।

एक महिला माननीया के साथ यह दुर्व्यवहार किसी सुनसान सड़क पर नहीं, बल्कि लोकतंत्र के मंदिर तुल्य विधानमंडल में हुआ। छेड़छाड़ करने वाला कोई आवारा गुंडा, या चोर उचक्का नहीं, बल्कि भाजपा का एक तथाकथित माननीय निकला। मारपीट करने वाला भी कोई और नहीं, भाजपा का ही ‘माननीय’ था।

आज सुशील मोदी को इस कुकृत्य को ढाँपने में शर्म नहीं आ रही? अपनी ही माँ बहनों से हुआ दुराचार पर इतनी घिनौनी चुप्पी? खून खून ना रहा, लाल पानी हो गया है। नारी के सम्मान में, अब क्यों नहीं उतरते मैदान में? क्या अब खुले में घूमते इन व्यभिचारी दुराचारी भाजपाइयों के डर से काम काजी महिलाएँ घर में घूँघट तान कर बैठ जाएँ? क्या संघ की नारी विरोधी मानसिकता को इसी बेशर्मी से भाजपाई हर कार्यालय में लागू करेंगे? क्या अब विधानसभा में भी रोमियो स्क्वाड की तैनाती करनी पड़ेगी, क्योंकि भाजपाई महिलाभक्षी, यहाँ भी महिलाओं को नोचने को तैयार बैठे हैं। कार्यालयों में इसी सोच के लोग महिलाओं का यौन शोषण करते हैं। जो परवश होकर बहता है, वो खून नहीं है, पानी है। जो हाई कमान के निर्देश पर इस अपमान को पचा जाए, वह इंसान नहीं, कोई रेंगने वाला प्राणी ही हो सकता है। जो महिला का सम्मान ना करे, उपभोग की वस्तु समझे, वह संघी मानसिकता का ही हो सकता है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जी भाजपा के इस उपाध्यक्ष व MLC को संरक्षण दे महिला उत्पीड़न को बढ़ावा दे रहे है। अन्यथा ऐसे सदस्य को तुरंत पार्टी से बर्खास्त करें।

बिहार को जंगलराज के तमगे से गाहे बगाहे नवाज़ने वाली मीडिया को साँप क्यों सूँघ गया है? क्या आज कलम की स्याही सूख गई है या पत्रकारिता की आत्मा ने मीडिया के शरीर को त्याग दिया है? इकतरफा रिपोर्टिंग को क्या बिहार का बहु संख्यक वर्ग पहचान नहीं पा रहा? बिलकुल पहचान रहा है। किसी ने आत्मा बेच खाया तो क्या देश का बहु संख्यक वर्ग अपना मस्तिष्क त्याग, आत्म सम्मान गँवा, मीडिया को नवाज़ते रहेगा?

फ़र्ज़ कीजिए कि छेड़ने वाला शख़्स गैर भाजपाई होता? फिर भाजपाई और उनके भोंपू कैसे छाती पीट रहे होते! बिहार ही नहीं, देश भर की मीडिया में चौबीसों घण्टे, यही मुद्दा छाया रहता। जंगलराज नाम का भेड़िया आया, चिंघाड़ चिंघाड़ कर मीडिया सबको बताती। अपने चुनावी भाषणों में मोदी जी यह मुद्दा उठाना ना भूलते। पीड़ित महिला का नाम देश के बच्चे बच्चे को याद हो जाता। पार्टी की तथाकथित इज़्ज़त बचाने के लिए, महिला की इज़्ज़त को कचरे दानी में फेंकने के बराबर समझा जा रहा है। बेटी पढ़ाओ, बेटी बचाओ का जुमला गढ़ने वाले महिलाओं को किस स्तर का समझते हैं, यह सोलह आने स्पष्ट हो गया है। अगर एक महिला की इज़्ज़त के लिए सभी महिलाएँ सड़कों पर ना उतरीं, तो कल किस मुँह से यह देश महिला उत्थान की बात करेगा? मोदी जी का चेहरा उन्हीं के पार्टी के लोग चमका रहे है। इनका यह विधान पार्षद उक्त महिला पार्षद साथ पहले भी छेड़खानी कर चुका है लेकिन मोदी जी ऐसे कारनामे करने वालों हमेशा बचते है। मैं माँग करता हूँ की सबसे पहले देशभर के भाजपा के सांसदों और विधायको को महिलाओं सम्मान करने की ट्रेनिंग दी जाए और उन्हें ही सबसे पहले उन्ही की Romeo स्क्वॉड के हवाले किया जाए।

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