इस हिंसा को राजनीति किस पेट में पचा लेगी? कश्मीर को भी ठहर कर सोचना चाहिए कि आग में जलकर राख के अलावा क्या मिलेगा। 17 साल से यात्रा शांति से ही गुज़र रही थी। इतनी सुरक्षा के बीच कोई हमला कैसे कर लेता होगा? शाम के बाद बस कैसे चली?

अपुष्ट ख़बरों के मुताबिक बस सुरक्षा घेरे में ही चल रही थी, तो फिर कौन है जो इतनी अचूक योजनाएँ बना लेता है और अंजाम दे देता है? सामने से पुलिस पार्टी पर हमला कर देता है?

आज तक किसी को अमरनाथ यात्रा की सुरक्षा पर ज़रा भी संदेह नहीं हुआ, पिछले साल तो इससे भी ख़राब माहौल में यात्रा हुई थी, तब तो कुछ नहीं हुआ, फिर ये दुखद घटना हो गई। हमारा शोक उस सामूहिक क्रंदन का हिस्सा भर है मगर उन साधारण परिवारों के घर ये हिंसा क्या मुँह लेकर पहुँची होगी। जिनकी भाषा रौद्र है, वो भी नकली हो चुकी है, जिनकी भाषा सौम्य है वो भी बेअसर हो चुकी है।

राजनीति सुननी नहीं है। वो अपनी मंशा खुद उजागर कर देगी । सब अपने मन की कर लें, पर इस हिंसा और उसके बाद की राजनीति का समापन तो हो। कश्मीर को मिलेगा क्या ? मिल क्या रहा है? आतंकवाद को निंदा नहीं, उसे जवाब भेजा जाए।

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