पेड़
जहाँ देखो पेड़ों का अभाव नजर आता है
क्या ऐसा भी दृश्य किसी को भाता है
हर ओर इमारतें ही छाई है
शायद दूर कहीं इनके पीछे
किसी पेड़ की परछाई है
जब कभी किसी आँगन में
कोई पेड़ नजर आता है
ह्दय पृसन्न होता है,
सोचता हुआ, कोई तो है
जो इन्हे देता है शरण, ऐसे में
जब हवा का भी
हो गया आधुनिकरण
ये किस दिशा में हम जा रहे है
जो पेड़ों की ये दशा है
शायद यही
आधुनिकता का नशा है       -सऊद अहमद

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