अक्सर छोटे बच्चों को कहते सुना होगा ये मेरे पापा का घर है तुम्हारें पापा का नहीं तुम यहां नहीं आ सकते हो। इसी तरह की भाषा का प्रयोग जब देश के प्रधानमंत्री करने लगे तो क्या कहा जा सकता है।

जबसे गुजरात चुनाव में पीएम मोदी के भाषणों का दौर शुरू हुआ तब से लेकर अब तक लगा ही नहीं ये भाषण 125 करोड़ जनता की नौमएंदगी करने वाला बोल रहा हो।

लोकसभा चुनाव के दौरान इसकी एक छोटी सी झलक देखी गई थी जिसमें वो प्रधानमंत्री के पद के लिए लड़ रहे थे। राहुल गाँधी को कभी शहजादा कहकर संबोधित करते तो कभी दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल को अनार्कारिस्ट बता देते।

चुनाव में अपनी भाषा गरिमा खोते प्रधानमंत्री मोदी चुनाव में इतना उग्र हो जाते है की फर्क करना मुश्किल होता की ये देश के प्रधानमंत्री है की बीजेपी के प्रवक्ता।

गुजरात चुनाव में नेहरु से लेकर इंदिरा गाँधी पर निशाना

आमतौर पर चुनाव स्वास्थ शिक्षा और रोजगार जैसे अहम मुद्दों पर लड़े जाते है मगर भारतीय राजनीति में बीजेपी ने इसे पहले धार्मिक बनाया फिर व्यक्तिगत बना दिया।

ताजा उदाहरण है हाल फिलहाल का ही है जब गुजरात के चुनावी दौरे पर राहुल गाँधी सोमनाथ मंदिर गए तो प्रधानमंत्री मोदी ने राहुल गाँधी पर निशाना साधते हुए कहा की ये मंदिर तुम्हारे नाना (जवाहर लाल नेहरु) ने नहीं बनवाया था।

उसी के ठीक बाद मोरबी में पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गाँधी पर निशाना साधते हुए कहा की जब इंदिरा गाँधी यहां आई थी तब उन्होंने मुहं पर रुमाल रखा हुआ था। दोनों ही मामलों में प्रधानमंत्री के भाषण की बड़ी फजीहत हुई और डिजिटल दौर में भाषण का सिर्फ महत्व ही कम नहीं हुआ बल्कि प्रधानमंत्री पद की गरिमा तक ध्यान में न रखी।

चुनाव गुजरात मॉडल पर होने थे मगर हार्दिक पटेल की सीडी से शुरू होकर अब राममंदिर पर टिक चुका है, प्रधानमंत्री मोदी को समझना ये बेहद ज़रूरी है की वो संघ के प्रचारक या बीजेपी के नेता नहीं है वो देश के प्रधानमंत्री है जिन्हें अपने से पहले प्रधानमंत्रियों का सम्मान करना होगा।

अगर ऐसा नहीं भी करते है तो सबसे पहले वो प्रधानमंत्रियों के जन्मदिवस जैसे मौके पर याद करना बंद कर दे और कोसना जारी रखे। क्योकिं चुनाव के दौरान उन्हें कोसकर फिर जन्मदिन जैसे मौके पर याद करना सिर्फ ढोंग और कुछ नहीं लगता है।

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