अमेरिका के जाने-माने वकील और लेखक एलन देर्शोवित्ज़ ने कहा था कि लोकतंत्र में स्पष्टता और जवाबदेही महत्वपूर्ण हैं लेकिन ढोंग के लिए लोकतंत्र में कोई जगह नहीं।

भारत के दुर्भाग्य में ये हो चुका है कि अब देश में स्पष्टता और जवाबदेही नहीं केवल ढोंग रह गया है। जब सत्ता के नशे में चूर गृह मंत्री राजनाथ सिंह ने कहा था कि एनडीए में इस्तीफे नहीं होते, तो उन्होंने ये इशारा दे दिया था कि आने वाले समय में ये सरकार किसी के प्रति जवाबदेही नहीं रखेगी।

पीएनबी घोटाले के बाद फिर से एक प्रश्न उठ रहा है कि घोटाला जब बैंक से जुड़ा है तो सरकार की ओर से मामले पर जवाब वित्त मंत्री क्यों नहीं दे रहे हैं? ये वो नैतिक प्रश्न है जो कई बार इस सरकार को लेकर उठ चुका है। लेकिन मोदी सरकार अपनी ये रिवायत तोड़ नहीं रही है।

बता दें, कि पीएनबी बैंक में 11,400 करोड़ का बैंक घोटाला हुआ है। इस घोटाले में आरोपी हीरा व्यापारी नीरव मोदी को बताया जा रहा है। नीरव मोदी देश के सबसे बड़े उद्योगपति मुकेश अम्बानी के रिश्तदार हैं, जिन्हें पीएम मोदी का करीबी माना जाता है। हाल ही में स्विट्ज़रलैंड के दावोस शहर में हुए वर्ल्ड इकोनोमी फोरम में भी नीरव मोदी को पीएम मोदी के साथ देखा गया था।

मोदी सरकार में अक्सर ये देखा गया है कि जिस मंत्रालय से जुड़ा मामला होता है, उस मंत्रालय का मुखिया उस मामले पर सवालों के जवाब नहीं देता बल्कि कोई दूसरे मंत्रालय का मंत्री उन सवालों के जवाब देता है। इस मामले में भी वित्त मंत्री अरुण जेटली की जगह कानून मंत्री रवि शंकर प्रसाद मीडिया का सामना कर रहे हैं।

अक्सर जवाब देने वाला मंत्री कई सवालों से ये कहकर पत्ता झाड़ लेता है कि उस विशेष मंत्रालय से ना होने के कारण उसको मामले के बारे में ज़्यादा जानकारी नहीं है। इसी के साथ बहुत ख़ूबसूरती से सवालों का सामना भी हो जाता है और जवाब भी नहीं दिया जाता।

वैसे सवालों का जवाब देने में इस सरकार की छवि ख़राब मानी जा रही है। विश्व के सबसे बड़े लोकतंत्र के प्रधानमंत्री और सरकार के मुखिया नरेंद्र मोदी ने अपने चार साल के कार्यकाल में एक भी प्रेस कॉन्फ्रेंस नहीं की है। उनके इस व्यवहार की आलोचना भारत में ही नहीं बल्कि अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर भी हो रही है। अक्सर अमेरिका और ब्रिटेन के अख़बारों में इस बात कपो लेकर उनकी आलोचना की जाती है।

हाल ही में हरियाणा में एक चुनावी सभा को संबोधित करते हुए अमित शाह ने कहा कि ये सरकार कांग्रेस को जवाब नहीं देगी। ये बात कहकर उन्होंने सार्वजानिक तौर पर लोकतंत्र की धज्जियाँ उड़ा दी। जब एक लोकतंत्र में सत्तापक्ष विपक्ष को उसके सवालों का जवाब ही नहीं देगा तो फिर लोकतंत्र का मंदिर कहे जाने वाली संसद किस लिए है। क्या वो सिर्फ महिला सांसदों की हसी का मज़ाक उड़ाने के लिए बनाई गई है। अगर यही शासन का तरीका है तो किसी तानाशाही राजतंत्र और लोकतंत्र में अंतर ही क्या है।

हज़ारों करोड़ के पीएनबी घोटाले पर अरुण जेटली का सामना ना आना सरकार का उनको बचाने का तरीका तो है ही साथ ही देश में धीरे-धीरे जनता के प्रति जवाबदेही खत्म करने का खेल भी है। जनता का पैसा एक कारोबारी लेकर विदेश भाग जाता है और जनता की नौकर सरकार उस मंत्री को भी सामने नहीं लाती है जिसके ऊपर इस मामले में जवाब देने की ज़िम्मेदारी है।

सरकार के लिए जो जनता की नौकर शब्द लिखा गया है वो आजकल चुनावी सभाओं के अलावा कही सुनने और पढ़ने के लिए नहीं मिलता है। क्योंकि एक ऐसा माहौल बनाया जा रहा है जिसमें जनता ये माने कि सरकार उसके लिए काम कर उसपर एहसान कर रही है। ये बात अलग है कि इसी लिए उस सरकार को जनता ने ही चुनकर वहां बिठाया है और विधायक से प्रधानमंत्री तक सबको महीने पर वेतन भी मिलता है।

कड़े फैसलों के नाम पर जनता पर ही ज़ुल्म किया जा रहा है और जवाब ये कहकर नहीं दिया जा रहा है कि ये सरकार एक मज़बूत सरकार है। लेकिन क्या सवाल यही है कि क्या विश्व के सबसे बड़े लोकतंत्र की सरकार को कठोर होना चाहए या जनता के प्रति जवाबदेह?

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