चेन्नई से 170 किलोमीटर दूर वेल्लुपुरम में लकड़ी के साइन बोर्ड पर बड़-बड़े अक्षरों में लिखा मेडिकल कॉलेज का नाम। बिना बाउंड्री का यह कॉलेज जहां न तो पर्याप्त कमरे हैं और न ही कोई लैबोरेटरी। पढ़ाने के लिए शिक्षक भी नहीं हैं लेकिन एक साल की फीस पाँच लाख रुपए है। पिछले दिनों यहाँ पढ़ने वाली तीन छात्राओं ने कुएं में कूदकर आत्महत्या कर ली। आत्महत्या का कारण कॉलेज की तरफ से फीस के लिए दबाव था।

दुनिया भर में आत्महत्या करने वालों का 17 प्रतिशत हिस्सा हमारे देश का है। कुल आत्महत्या करने वालों में 34 प्रतिशत लोग 15 से 34 वर्ष के आयुवर्ग के होते हैं। हमारे देश में हजारों युवक अवसाद के कारण हर साल आत्महत्या कर लेते हैं। अवसाद का कारण आर्थिक बदहाली, परीक्षाओं में असफलता और बेरोजगारी होती है। ब्रिटिश जर्नल लैंसेट के अनुसार 2004 से 2008 के बीच लगभग 16000 युवकों ने आत्महत्या की। जर्नल के अनुसार पूर्वी भारत और दक्षिण भारत में अपेक्षाकृत ज्यादा आत्महत्या होती हैं। तमिलनाडु के वेल्लोर में एक लाख लोगों में लगभग 148 महिलाएं और 58 पुरुष विभिन्न कारणों से आत्महत्या करने को मजबूर होते हैं।

पिछले कुछ सालों में इंजिनीयरिंग और मेडिकल कॉलेजों की संख्या में बेतहाशा बढ़ोत्तरी हुई है। प्राइवेट कॉलेजों पर सरकार की तरफ से नियमन में कोई खास मजबूती न होने के कारण ऐसे कॉलेज मनमाने तरीके से एडमीशन की प्रक्रिया करते हैं और ज्यादा फीस भी वसूलते हैं। माँ बाप अपने बच्चों को इंजीनियर और डॉक्टर बनाने की चाह में भारी फीस भरकर ऐसे क़ॉलेजों में प्रवेश दिलाते हैं। अधिकतर छात्र यहाँ से जैसै तैसे डिग्री तो ले लेते हैं लेकिन नौकरी नहीं मिल पाती है। ऐसे में उनके हाथ लगती है हताशा जो कि अवसाद का करण बनती है।

भारत में कुल आत्महत्या करने वालों में हर साल दो से लेकर बारह प्रतिशत तक ऐसे युवा होते हैं जो अवसाद से ग्रसित होते हैं। एक अध्ययन के अनुसार 1987 से 2007 के बीच आत्महत्या में आठ से दस फीसदी तक वृद्धि दर्ज की गई है। अकेले तमिलनाडु में ही 2012 में आत्महत्या के 12.5 प्रतिशत केस सामने आए। वर्तमान में हमारे देश में किसान और युवा अनेक कारणों से आत्महत्या के लिए मजबूर होते हैं। विभिन्न शोध संस्थान लगातार अपने चौकाने वाले आत्महत्या के आकड़ों से सरकार और प्रशासन का ध्यान इस ओर खींचने की कोशिश करते रहे हैं लेकिन हालत दिनों दिन चिंताजनक होती जा रही है।

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