गोदी मीडिया, बिकाऊ मीडिया को लेकर ये शब्द और ये वर्तमान दौर हमेशा याद रखा जाएगा क्योंकि इस तरह कभी कोशिश नहीं की गई कि किसी ना किसी तरह चीज़ों को सरकार के पक्ष में करने की और झूठ का माहौल बनाकर बाग़ों में बहार बताने की।

भारत के इतिहास में सबसे चर्चित घोटालों में से एक राफेल विमान समझौते पर नियंत्रक और लेखा परीक्षक सामान्य (कैग) की रिपोर्ट आ चुकी है। रिपोर्ट को लेकर कहा जा रहा है कि इसमें घोषित कर दिया गया है कि मोदी सरकार का राफेल समझौता यूपीए सरकार से सस्ता है।

बताया जा रहा है कि कैग ने मोदी सरकार के समझौते को पिछली सरकार से 2.86% सस्ता बताया है। मीडिया वेबसाइटों पर ये खबर छाई हुई है। ये नहीं पूछा जा रहा है कि कैग ने क्यों अपनी रिपोर्ट में अभी भी जहाज़ की कीमत नहीं बताई है और किस आधार पर डील को सस्ता बताया है?

ये भी नहीं पूछा जा रहा है कि कैग प्रमुख राजीव महर्षि जो खुद राफेल सौदे के समय वित्त सचिव थे उनके दावे पर आँख मूंदकर कैसे भरोसा किया जाए? सबसे बड़ी बात इस रिपोर्ट में भी मोदी सरकार पर उठाएं गए सवाल का ज़िक्र कहीं नहीं है। जी हाँ, रिपोर्ट में कहा गया है कि ये समझौता देशहित में नहीं है।

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कैग इस रिपोर्ट में बैंक गारंटी का वहीं प्रशन उठाया जा रहा है जिसे लेकर यूपीए और मोदी सरकार के सौदा की तुलना की जा रही थी। रिपोर्ट में बताया गया है कि यूपीए सरकार के सौदे में भारत के पक्ष में जहाज़ के लिए दी गई एडवांस पेमेंट (पेशगी भुगतान) की बैंक गारंटी थी जबकि मोदी सरकार की डील में ऐसा नहीं है।

दरअसल, यूपीए सरकार के सौदे में ऐसा था कि जहाज़ बनाने के लिए कुछ पैसा एडवांस पेमेंट के तौर पर डसौल्ट को दिया जाना था और बाकि का फ़्रांस सरकार को बैंक गारंटी के तौर पर।

इसका लाभ ये था कि जैसे जैसे जहाज़ों की डिलीवरी होती वैसे-वैसे पैसा कंपनी को पैसा मिलता और डिलीवरी ना होने, ख़राब गुणवत्ता या किसी और समस्या की स्तिथि में फ़्रांस सरकार पैसे और डील को लेकर नैतिक तौर पर उत्तरदायी होती और स्तिथि भारत के पक्ष में रहती। जबकि मोदी सरकार की डील में बैंक गारंटी को हटा दिया गया है।

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अब अगर इस सौदे में कोई समस्या होने पर भारत के पास कुछ नहीं होगा। इस तरह ये डील देशहित में नहीं है। लेकिन सरकार की गोद में बैठा गोदी मीडिया रिपोर्ट के संदिग्ध भाग को सत्य बता रहा है और सरकार पर उठाएं गए प्रश्नों को छुपा रहा है। क्या है विवाद राफेल एक लड़ाकू विमान है जिसे भारत फ्रांस से खरीद रहा है।

कांग्रेस ने मोदी सरकार पर आरोप लगाया है कि मोदी सरकार ने विमान महंगी कीमत पर खरीदा है और इस डील से उद्योगपति अनिल अंबानी को फायदा पहुँचाया है। जबकि सरकार का कहना है कि यही सही कीमत है।

बता दें, कि इस डील की शुरुआत UPA शासनकाल में हुई थी। कांग्रेस का कहना है कि UPA सरकार में 12 दिसंबर, 2012 को 126 राफेल विमानों को 10.2 अरब अमेरिकी डॉलर (तब के 54 हज़ार करोड़ रुपये) में खरीदने का फैसला लिया गया था। इस डील में एक विमान की कीमत 526 करोड़ थी।

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इनमें से 18 विमान तैयार स्थिति में मिलने थे और 108 को भारत की सरकारी कंपनी, हिंदुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमिटेड (एचएएल), फ्रांस की कंपनी ‘डसौल्ट’ के साथ मिलकर बनाती। अप्रैल 2015, में प्रधानमंत्री मोदी ने अपनी फ़्रांस यात्रा के दौरान इस डील को रद्द कर इसी जहाज़ को खरीदने के लिए में नई डील की। ये डील 7.87 अरब यूरो में हुई। इस हिसाब से एक राफेल विमान की कीमत लगभग 1541 करोड़ रुपये होगी और केवल 36 विमान ही खरीदें जाएंगें।

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