Railway Station
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मोदी सरकार ने अपने चहेते उद्योगपतियों को उपकृत करने के लिए बड़े बड़े शहरों के रेलवे स्टेशन ही उनके नाम करने का फ़ैसला कर लिया है।

निजी कंपनियां रेलवे स्टेशन के ठेके लेने के लिए एक टांग पर तैयार खड़ी है क्योंकि उन्हें मुफ्त के भाव रेलवे स्टेशन से लगी जमीनो की लीज कम से कम 99 सालों के लिए मिल जाएगी। कल ही चार बड़े रेलवे स्टेशन की बोली मंजूर की गई है ये है ग्वालियर, अमृतसर, नागपुर और गुजरात के साबरमती रेलवे स्टेशन।

इस खबर के साथ यह भी लिखा गया है कि, स्टेशनों में रियल एस्टेट का हब भी विकसित किया जाएगा। वहां आवासीय फ्लैट तो होंगे ही, वहां मॉल और शैक्षणिक संस्थान भी बनाये जाएंगे। रेलवे अपने स्टेशनों को हवाई अड्डे की तरह विकसित करना चाहता है, जिसे रेलोपोलिस नाम दिया गया है।

इससे पहले 2019 में चंडीगढ़ आनंद विहार, सिकंदराबाद, पुणे और बेंगलूरु सिटी के रेलवे स्टेशन को 99 साल की लीज पर पर देने के लिए बोलियां लगाई गई थी ऐसे कुल मिलाकर 400 रेलवे स्टेशन है इनमें से 68 स्टेशनों का पुनर्विकास प्राथमिकता के आधार पर प्रारंभ करने का निर्णय 2018 में ही ले लिया गया था।

योजना यह बनाई गई है कि रेलवे स्टेशन की बोली को जीतने वाली कंपनी को कमर्शियल यूज के लिए करीब कम से कम 25 लाख स्केयर फुट जगह उपलब्ध हो जिनमें 30 फीसदी आवासीय उद्देश्य के लिए इस्तेमाल की जाए ‘डेवलपमेंट मिश्रित उपयोग वाला होगा, यानी कमर्शियल भी ओर रेसिडेंशियल भी जिससे कंपनियों को जबरदस्त फायदा मिले।

एक ओर ग़जब का प्रावधान किया गया है रेलवे स्टेशन के विकास की ऐसी परियोजना को अग्रणी बैंकों से लोन दिलाने के लिए ऐसी परियोजनाओं को बुनियादी ढांचा का दर्जा दिया जाएगा। यानी मुफ्त के भाव मे कर्ज ओर लगभग मुफ्त के ही भाव 99 साल की लीज पर जमीनें।

अगर पूरे देश मे रेलवे के आधिपत्य की बेशकीमती जमीनों का सर्वे किया जाए तो यह जमीनें किसी भी छोटे से राज्य से अधिक निकलेगी। ये सारी जमीन प्राइम लोकेशन पर स्थित है यह कितना बड़ा घोटाला है आप अंदाजा भी नही लगा सकते।

मोदी सरकार इन बेशकीमती जमीनों को कौड़ियों के भाव में 99 साल की लीज अडानी जैसे उद्योगपतियो को सौप देना चाहती है।

दअरसल नारा आपने गलत सुना था। सही नारा- ‘सबका साथ सबका विकास’ नहीं है, सही नारा है- ’33 प्रतिशत जनता का साथ और अडानी अंबानी जैसे उद्योगपतियों का विकास’।

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