नया साल शुरू होने के साथ ही तमाम राजनीतिक दलों ने 2019 लोकसभा चुनाव की तैयारी शुरू कर दी है। यूपी में सपा-बसपा गठबंधन के बाद कोलकाता में 19 जनवरी को ममता बनर्जी ने यूनाइटेड इंडिया रैली की। साल की शुरुआत में विपक्षी एकता के शक्ति प्रदर्शन का यह पहला मौका था।

सीएम ममता बनर्जी के नेतृत्व में हुए इस महारैली का नाम ‘UnitedIndiaAtBrigade’ खुद को जस्टिफाई करता दिखा क्योंकि देश भर के 20 से ज्यादा पार्टियों के दिग्गज नेताओं इसमे हिस्सा लिया। और मीडिया रिपोर्ट की माने तो करीब 10 लाख लोग इन नेताओं को सुनने आए।

सत्ताधारी बीजेपी के लिए ये परेशानी की बात हो सकती है। लेकिन खबर ये है कि इस महारैली से कुछ मीडिया संस्थान भी परेशान दिखे। ये वही मीडिया संस्थान हैं जो कोबरा पोस्ट की स्टिंग में अपनी ‘बोली’ लगा चुके हैं।

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और यही वजह है कि मीडिया संस्थान और बीजेपी के आईटी सेल में फर्क करना मुश्किल हो गया है। महारैली की कवरेज करते हुए ABP NEWS ने लिखा ‘मोदी एक दुश्मन अनेक’

पहले ऐसे जुमले बीजेपी के प्रवक्ताओं और आईटी सेल के माध्यम से ही उछाले जाते थे लेकिन अब ABP NEWS जैसे मीडिया संस्थान भी लिखने लगे हैं। मीडिया की इसी स्तरहीन पर लगातार निगाह रखने वाले युवा पत्रकार दीपांकर ने फेसबुक पर ABP NEWS का स्क्रीनशॉट शेयर करते हुए लिखा है…

‘क्या ABP न्यूज भाजपा के IT-सेल की भाषा नहीं बोल रहा है? क्या ABP न्यूज ने BJP के IT- सेल से इन्टर्नशिप किये लोग भर्ती कर लिए हैं या पूरा नोयडा दफ्तर ही BJP की प्रचार मशीनरी में तब्दील हो गया है? क्या लोकतंत्र में विपक्षी पार्टियां दुश्मन होती हैं? क्या मोदी सरकार बिना गठबंधन के 2014 का चुनाव जीत पाती?

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क्या NDA में अकेला मोदी है? “मोदी एक ‘दुश्मन’ अनेक” जैसी जैसी लाइने पिछले 4 साल से चल रही हैं। पिछले चार सालों में जब भी भाजपा-RSS के साम्प्रदायिक हिन्दुत्व का मुकाबला करने के अलग-अलग पार्टियां समाने आयी उन्हें BJP के IT-सेल ने शेर के पीछे भागते भेड़िए की तरह पेश किया। IT सेल का यही काम अब ABP न्यूज कर रहा है।’

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ABP न्यूज विपक्षी दलों को दुशमन क्यों बता रहा है इसका जवाब तो कोबरा पोस्ट के स्टिंग में मिल चुका है लेकिन अकेला किस आधार पर लिखा है ये समझ पाना मुश्किल है। क्योंकि बीजेपी जिस NDA (National Democratic Alliance) की हिस्सा है, उसमें कुल 42 पार्टियां हैं। यानी नरेंद्र मोदी 42 पार्टियों के साथ मिलकर सरकार चला रहे हैं।

फिलहाल कुल 17 राज्यों में बीजेपी की सरकार बताई जाती है, लेकिन अपने दम पर सिर्फ 10 राज्यों में ही सत्ता में है। बाकि राज्यों में सहयोगी दलों के साथ मिलकर सरकार चला रहे हैं। क्या मीडिया के पास ये आंकड़े नहीं हैं? गोदी मीडिया जिस रास्ते पर भारतीय लोकतंत्र को ले जाना चाहता है, उसका रास्ते का अंत व्यक्तिवाद और तानाशाही के उदय के साथ होता है।

लोकतांत्रिक व्यवस्था राजतंत्र या तानाशाही व्यवस्था से इसलिए बेहतर होता है क्योंकि यह जनपक्षधर होता है। लोकतांत्रिक व्यवस्था में जनता अपना प्रतिनिधि खुद चुनाती है। राजतंत्र या तानाशाही व्यवस्था के उलट लोकतांत्रिक व्यवस्था में सत्ता से सवाल पूछने की पूरी आजादी होती है।

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और शायद इसलिए मीडिया को लोकतंत्र का चौथा स्तम्भ माना जाता है क्योंकि वह हर वक्त प्रश्नकर्ता की भूमिका में होता है। सत्ता बैठे लोगों से सवाल पूछना ही मीडिया का कर्तव्य होता है। लेकिन पिछले कुछ सालों से भारतीय मीडिया के कुछ संस्थान सत्ता के सामने नतमस्तक हो चुके हैं। ऐसे संस्थान सत्ता में बैठे लोगों की भक्ति को अपना असली कर्तव्य मान चुके हैं।

सत्ता से सावल तो दूर की बात हो गई, अब कुछ मीडिया संस्थान सत्ता का गुणगान करने लगे हैं। सवाल न पूछे जाने की स्थिति में सत्ताधारी दल (बीजेपी) लगातार बेलगाम होती जा रही है, सवाल पूछने वाले सामाजिक कार्यकर्ताओं, पत्रकारों, छात्रों पर राजद्रोह और रासुका लगाया जा रहा है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का कार्यकाल खत्म होने वाला है लेकिन अभी तक उन्होंने एक भी प्रेस कॉन्फ्रेंस नहीं किया। विचारधारा और पैसों के लिए मीडिया खुद को बेचने को भी तैयार है, ये हालात लोकतंत्र के लिए बेहद खतरनाक हैं।

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