वरिष्ठ अधिवक्ता प्रशांत भूषण को सुप्रीम कोर्ट और सीजेआई पर दो ट्वीट्स के लिए अवमानना का दोषी करार दिए जाने पर बार एसोसिएशन ऑफ इंडिया की कार्यकारी समिति ने नाराज़गी जताई है।

मंगलवार (18 अगस्त) को समिति ने एक बयान जारी कर कहा कि “बोलने की आज़ादी” और “आलोचना करने की आज़ादी” एक संस्था के काम को लोकतांत्रिक साधनों के ज़रिए सुधार लाने के लिए ज़रूरी है। सुप्रीम कोर्ट का वर्तमान केस में फैसला, संस्थान की प्रतिष्ठा को फायदा पहंचाने से ज़दाया नुकसान पहुंचा सकता है।

समिति ने कहा, “सू-मोटो की शक्ति के इस्तेमाल से लिए गए ऐसे फैसले जो अभिव्यक्ति की आज़ादी की कवायद पर रोक लगाते हैं, वो काफी पुराने हैं। भारत के सर्वोच्च न्यायालय की प्रतिष्ठा को कुछ ‘ट्वीट’ से खारिज नहीं किया जा सकता”।

एसोसिएशन के अध्यक्ष डॉ. ललित भसीन द्वारा हस्ताक्षरित पत्र में कहा गया है कि एसोसिएशन ने भूषण मामले में एक हस्तक्षेप आवेदन दायर किया था, लेकिन वह एससी रजेस्ट्री द्वारा सूचीबद्ध नहीं किया गया।

अपने आवेदन में, एसोसिएशन ने स्वीकार किया था कि बार के सदस्यों का “न्यायपालिका, न्यायिक अधिकारियों और न्यायिक आचरण से संबंधित संस्थागत और संरचनात्मक मामलों पर बोलने का कर्तव्य था”।

समिति द्वारा जारी किए गए बयान में बार और बेंच के कर्तव्य पर जोर दिया गया है, ताकि न्याय प्रदान करने के लिए एक साथ काम किया जा सके और संस्थानों के कामकाज की आलोचना करने के लिए भाषण की स्वतंत्रता सुनिश्चित की जा सके।

बयान में कहा गया है, प्रखर आलोचना, टिप्पणी, व्यंग्य और हास्य एक मुक्त समाज में संस्थानों के निर्माण में मदद करते हैं। बता दें कि इससे पहले सुप्रीम कोर्ट और हाई कोर्ट के कई जजों ने प्रशांत भूषण का समर्थन करते हुए सुप्रीम कोर्ट के फैसले को ग़लत बताया था।

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here