चुनाव नज़दीक हैं पर मीडिया असल मुद्दों से दूर खड़ा है। पिछले कुछ दिनों में मीडिया की लगभग सभी खबरें भारत- पाकिस्तान युद्ध के इर्द-गिर्द ही चक्कर खा रही हैं।

पिछले गुरूवार आई रिपोर्ट के अनुसार एशिया की तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था भारत में GDP की वृद्धि तीसरी तिमाही में 6.6 प्रतिशत पर आ गई, जो तीन महीनों में नवंबर के अंत तक 7.1 प्रतिशत से लगातार गिरावट में है।

भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जिन्होंने 2014 चुनाव के दौरान लाखों नौकरियां देने और अर्थव्यवस्था को उठाने का वादा किया था वो इस साल अप्रैल-मई के चुनाव रैलियों में भी इन्हीं मुद्दों को अलग तरह से दोहरा रहे हैं।

मंगलवार को बसपा प्रमुख मायावती ने ट्वीट पर पीएम मोदी पर निशाना साधा। मायावती ने लिखा है कि ‘वैसे तो 130 करोड़ भारतीय जनसंख्या में से अधिकतर गरीबों, मज़दूरों, किसानों, आदि को विकास का सही लाभ नहीं मिलने से देश चिंतित है, फिर भी GDP विकास दर पिछले 19 महीने के मुकाबले सबसे कम मात्र 6.6 प्रतिशत रहने पर अब चुनाव के समय में इसपर पीएम का जवाब व जुमलेबाज़ी क्या होगी?’

स्वतंत्र अर्थशात्री आशुतोष दातर ने कहा है, “संख्या निराशाजनक है और विकास की गति धीमी पड़ रही है और मोदी सरकार अब और चुनावों के बीच कुछ भी नहीं कर सकती है।” कमजोर उपभोक्ता खर्च और निवेश में मंदी के लिए इन आंकड़ों को दोषी ठहराया गया।

भारत के केंद्रीय सांख्यिकी कार्यालय ने भी वित्त वर्ष के लिए अपने विकास के अनुमान को संशोधित करते हुए मार्च में समाप्त होने वाले 7.2 प्रतिशत के पिछले प्रक्षेपण से गिराकर सात प्रतिशत बताया है।

भारत की अर्थव्यवस्था पर एक रिपोर्ट में डीबीएस ग्रुप ने कहा कि कुछ सुधारों के बावजूद, व्यापार के माहौल में एक स्वागत योग्य सुधार और शासन में गिरावट आई है, विकास में कमी रही है। डीबीएस ग्रुप रिसर्च टीम के अनुसार बचत-निवेश का अंतर बढ़ा हुआ ही है और वित्तीय क्षेत्र में तनाव अधिक है।

मुख्य अर्थशास्त्री तैमूर बैग और अर्थशास्त्री राधिका राव ने डीबीएस ग्रुप कि रिसर्च मे कहा है कि पाकिस्तान के साथ राजनीतिक तनाव भी गिरावट के लिए ज़िम्मेदार है। रिपोर्ट मे लिखा है कि सीमा पर तनाव उस समय उलझा है जब भारत मे अप्रैल-मई मे आम चुनाव नज़दीक है जबकि पाकिस्तान की अर्थव्यवस्था कमजोर स्थिति में है।

कई विशेषज्ञों ने गिरते GDP पर चिंता जताई है। मंबई आधारित अर्थशात्री सुजान हाजरा ने कहा, “कमजोर वृद्धि और जारी सुरक्षा मुद्दों के आधार पर विदेशी निवेशक भारत से दूर रह सकते हैं।”

विशेषज्ञों कि मानें तो ब्याज दर में कटौती की जरूरत है। बता दें कि पिछले साल के अंत में मोदी के सहयोगी के रूप में व्यापक रूप से देखे जाने वाले शक्तिकांत दास को भारतीय रिजर्व बैंक का गवर्नर नियुक्त किया गया था और उन्होंने कहा कि वह नियमित रूप से सरकार के साथ परामर्श करेंगे।

फिलहाल चुनाव से पहले वर्तमान समय मे ना ही कुछ खाते बन सकता है ना उगलते। जो चल रहा है यूंही चलता रहेगा और रैलियों मे वादों से पेट भरते रहना पड़ेगा।

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