अदनान अली

वित्तीय 2019-20 ख़त्म होने और आंकड़ें बाहर आने से ये बात खुलकर सामने आ रही है कि अर्थनीति को मोदी सरकार का प्रशासनीय क्षमता एक बार फिर से असफल रही है। देश में निजी निवेश गिरने के बाद अब बैंक भी हाथ खीचते नज़र आ रहे हैं।

हाल ही में आरबीआई ने जो आंकड़ें दिए हैं उस से पता चला है कि भारतीय सार्वजानिक बैंकों और निजी बैंकों ने अपनी ज़्यादातर राशि आरबीआई में जमा करा दी है। इन बैंकों ने 8 लाख करोड़ रु आरबीआई में जमा करा दिए हैं। वर्तमान में यह ख़राब सरकार के लिए एक झटका है क्योंकि सरकार बैंकों से लोगों को लोन देने का आग्रह कर रही है।

सरकार ने इसी संबंध हाल ही में बैंकों के लिए क्रेडिट गेरेंटी योजना का भी एलान किया है। लेकिन बाज़ार मांग और खपत की गिरवी दर को देखकर बैंक लोन देने से कतरा रहे हैं। गौरतलब है कि नवम्बर 2019 में ही राष्ट्रीय सांख्यिकी कार्यालय (NSO) द्वारा उपभोग व्यय सर्वे में बताया गया था कि भारत में उपभोक्ता खर्च 3,.7% घट गया है और ऐसा पिछले 40 सालों में पहली बार हुआ है।

30, मई 2020 के ‘द हिन्दू’ अख़बार में दी गई खबर में वित्त मंत्रालय के एक वरिष्ठ अधिकारी ने भी नाम ना सामने लाने की शर्त पर इस बात की पुष्टि की है। 22 मई 2020 को ही देश के केन्द्रीय बैंक आरबीआई ने रेपो रेट को 40 बीपीएस कम कर 4% कर दिया है। पिछले साल फरवरी से आरबीआई रेपो रेट को 250 बीपीएस कम कर चुका है। ये कदम इसलिए उठाया गया ताकि बैंक अधिक लोन देना शुरू करें। इसके बावजूद बैंक बाज़ार लोन देने के लिए तैयार नहीं है।

दरअसल, पिछले कुछ सालों से बैंकों के दिए गए लोन एनपीए में तब्दील हो रहे हैं, एनपीए यानी वो लोन बैंक को जिनका भुगतान आना रुक जाता है। पिछले कुछ सालों में बैंकों में कई बड़े घोटाले हुए हैं, इसमें से विजय माल्या और नीरव मोदी कुछ मशहूर नाम हैं जो भारतीय बैंकों के हज़ारों करोड़ रुपए लेकर भागे हैं।

इसके अलावा अगर छोटे व्यवसायों की बात करें तो उन्हें भी अब बैंक लोन देने से कतरा रहे हैं क्योंकि वो भी बैंकों के लोन की अदायगी करने में असमर्थ हैं। छोटे और मध्यम व्यवसायों (एमएसएमई) को मुद्रा लोन योजना के अंतर्गत दिया गए 2.52%% लोन एनपीए में तब्दील हो चुके हैं।

बता दें कि नोटबंदी और जीएसटी के बाद छोटे और मध्यम व्यवसायों की कमर टूट चुकी है और इसलिए उसे लोन भुगतान करने में मुश्किल का सामना कर पड़ रहा है। इसलिए बैंक चाहते हैं कि मोदी सरकार इस क्षेत्र की मदद ‘डायरेक्ट कैश ट्रान्सफर’ जैसी योजनाओं से करे लेकिन सरकार अपना पल्ला झाड़कर बैंकों को ये ज़िम्मेदारी देना चाहती है। एनपीए से जूझ रहे बैंक भी ये ज़िम्मेदारी नहीं लेना चाहते हैं और अब इस सबका खामियाज़ा जनता भुगत रही है।

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