बेस्ट फिल्म का फिल्मफेयर पुरस्कार जीतने वाली ‘पीपली लाइव’ में एक गाने का बोल है- ‘राई पहाड़ है कंकर शंकर, बात है छोटी बड़ा बतंगड़, इंडिया सर ये चीज़ धुरंधर।’ 

इस लाइन में गहरी सच्चाई है। फिलहाल भारत में छोटी से छोटी बात को बतंगड़ बनाने का काम गोदी मीडिया के पास है। अगर मामला विपक्षी नेताओं से जुड़ा हो तब तो बतंगड़ नेक्स्ट लेवल पर पहुंच जाता है। जहां एक तरफ दुनिया भर की मीडिया अपने यहां के सत्ताधीशों से सवाल कर रही है, वहीं भारत के कुछ मीडिया संस्थान विपक्ष की आलोचना करने और सत्ताधारी दलों का गुणगान करने के लिए कुख्यात हो चुके हैं।

ताजा मामला मायावती की बहुजन समाज पार्टी से जुड़ा है। दरअसल साल 2009 में रविकांत नाम के एक व्यक्ति ने सुप्रीम कोर्ट में जनहित याचिका दाखिल कर मूर्ति निर्माण पर हुए करोड़ों के खर्च को बसपा से वसूलने की मांग की थी।रविकांत चाहते हैं कि मायावती और बसपा चुनाव चिन्ह की मूर्तिर्यों (हाथी) के निर्माण पर हुए खर्च को बसपा से वसूला जाए।

इसी याचिका पर सुनवाई करते हुए आज यानी 8 फरवरी को चीफ जस्टिस रंजन गोगोई ने कहा हमारा प्रारंभिक विचार है कि मैडम मायावती को मूर्तियों का सारा पैसा अपनी जेब से सरकारी खजाने को भुगतान करना चाहिए।

चीफ जस्टिस का ये प्रारंभिक विचार है, आदेश नहीं है। प्रारंभिक विचार और आदेश में बहुत फर्क होता है। इस मामले में अगली सुनवाई 2 अप्रैल को होगी। मतलब अभी इस मामले में फैसला भी नहीं आया है।

अगर फैसला नहीं आया। कोर्ट ने आदेश नहीं दिया फिर मीडिया क्यों बार-बार ये लिख रहा है कि ‘सुप्रीम कोर्ट का आदेश, मूर्तियों पर खर्च हुआ जनता का पैसा मायावती वापस लौटाएं’

यहां नवभारत टाइम्स एक उदाहरण है। गूगल करने पर पता चलता है तमाम मीडिया संस्थानों ने ये गलती/जालसाजी की है। तो क्या यही वो लक्षण हैं जो मीडिया को गोदी मीडिया बनाते हैं?

मीडिया इस मामले में लगातार भ्रम फैला रहा है, जबकि सुनवाई के दौरान कोर्ट में मौजूद रहे बसपा सांसद सतीश मिश्रा मीडिया में बता चुके हैं कि चीफ जस्टिस ने जो भी कहा वो महज एक मौखिक अवलोकन है। जो आर्डर हुआ है वो ये है कि इस मामले की अगली सुनवाई 2 अप्रैल को होगी।

दरअसल भारतीय मेनस्ट्रीम मीडिया का जातीय चरित्र है। मेनस्ट्रीम मीडिया में डिसीजन मेकिंग पदों पर ज़्यादातर सवर्ण पुरूष हैं। ऐसे में दलित पावरहाऊस मानी जाने वाली ‘दलित महिला’ मायावती और दलितों का नेतृत्व करने वाली बसपा से सवर्ण मीडिया का घृणा करना बहुत आम बात है।

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और ये घृणा कोई नई बात भी नहीं है। भारत का मेनस्ट्रीम मीडिया कांशीराम के वक्त से बसपा के खिलाफ जहर उगलता रहा है। शायद यही वजह है कि मायावती अपने समर्थकों से ‘मनुवादी मीडिया’ से सावधान रहने की अपील करती रहती हैं।

मीडिया को लेकर मायावती का जो रुख रहता है वो उन्हें उनके राजनीतिक गुरू कांशीराम से मिला है। बसपा संस्थापक कांशीराम की यह रणनीति रहती थी पार्टी को मीडिया से दूर रखा जाए।

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