राफेल डील पर एक बार फिर अंग्रेजी अख़बार ‘द हिंदू’ ने खुलासा किया है. अख़बार ने दावा करते हुए कहा है कि राफेल डील यूपीए सरकार के वक़्त की तय की गई कीमत और शर्तो पर खरी नहीं उतरती है. साथ ही इस बात का भी खुलासा किया है इसे लेकर तीन अधिकारियों ने अपनी असहमति जताई थी फिर भी ये डील हुई.

दरअसल राफेल डील को लेकर आपत्ति करने वाले तीन अधिकारियों ने अपनी असहमति जताते हुए एक जून (2016) को डिसेंट नोट दिया था. जिसमे उनका कहना था कि ‘एस्कलेशन के आधार पर फ्रांस सरकार ने विमानों की जो अंतिम कीमत तय की है, वह पहले तय बेंचमार्क कीमत से 55.6 फीसदी ज्यादा है. आपूर्ति के समय तक एस्कलेशन के आधार पर यह कीमत और बढ़ सकती है.

अख़बार का कहना है कि भारतीय पक्ष राफेल डील में एक बेंचमार्क कीमत तय करना चाहता था, लेकिन फ्रांसीसी पक्ष ने इसको एस्कलेशन यानी बढ़ते रहने के फॉर्मूले में बदल दिया.

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हैरान करने वाली बात है की इस डील से अधिकारियों की शिकायत को भी नज़रंदाज़ किया गया क्योंकि नोट देने के बाद दोनों देशों (फ़्रांस और भारत) के बीच 23 सितंबर, 2016 को हुए अंतर सरकारी समझौते से तीन महीने पहले ही दे दिया गया था. मगर फिर भी अधिकारियों के असहमति को नज़रअंदाज़ कर दिया गया.

अधिकारियों ने कई बार आप्पति जताई उसके बाद अब सवाल उठाना लाजमी हो जाता है की अधिकारियों की असहमति के बाद भी ये डील करने के पीछे आखिर मोदी सरकार क्यों मजबूर हुई ? जैसे 126 विमानों के बजाय मोदी सरकार ने सिर्फ 36 विमान क्यों लिए, इससे जुड़े कई सवाल अख़बार ने उठाये है.

दरअसल इस सौदे को लेकर रक्षा मंत्रालय के तीन एक्सपर्ट अधिकारी थे जिनमें एक एडवाइजर थे एम पी सिंह जो इंडियन कॉस्ट एकाउंट्स सर्विस में संयुक्त सचिव स्तर के अधिकारी के पद पर थे, दूसरे एक्सपर्ट थे ए. आर. शुले जोकि फाइनेंशियल मैनेजर (एयर) के तौर पर इस डील में शामिल थे वहीँ एक्विजिशन मैनेजर (एयर) और संयुक्त सचिव का काम राजीव वर्मा के जिम्मे था.

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इन तीनों ने राफेल डील होने से कुछ महीने पहले यानि की एक जून साल 2016 को इस बात की शिकायत डिप्टी चीफ ऑफ एयर स्टाफ (DCAS) को डील को लेकर हुई बातचीत पर अपना कड़ा विरोध जताते हुए नोट भेजा था.

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