लॉकडाउन का चौथा चरण चल रहा है लेकिन महाराष्ट्र में प्रवासी मज़दूरों की दिक्कतें थमने का नाम नहीं ले रहीं। 19 मई को मुंबई के बांद्रा रेलवे स्टेशन पर मज़दूरों की भीड़ इकट्ठा हो गयी, सभी अपने घर जाना चाहते थे। पुलिस ने उन सभी मज़दूरों को बलपूर्वक हटाया जिनके पास श्रमिक ट्रेनों में सफर करने की टिकट नहीं थी. भीड़ का एक बड़ा हिस्सा हताश होकर वापस चला गया।

तमाम खबरों के अनुसार, पुलिस ने मजदूरों पर लाठीचार्ज भी किया है।

ऐसा पहली बार नहीं हुआ है जब मज़दूरों की भीड़ बांद्रा रेलवे स्टेशन पर इकठ्ठा हुई हो। 14 अप्रैल को जब पहला लॉकडाउन पूरा हुआ तब भी ठीक इसी तरह से मज़दूरों की भीड़ स्टेशन पर पहुंची थी। इस पूरे प्रकरण के दोहराने से साफ़ पता चलता है कि महाराष्ट्र सरकार ने उसके बाद न तो मज़दूरों का ख्याल रखने का कोई ख़ासा प्रबंध किया और न ही पुरानी घटना से कुछ सीखा।

केंद्र सरकार और रेल मंत्रालय पर तो सवाल हैं ही कि वो मज़दूरों के लिए ज़रूरत अनुसार प्रबन्ध क्यों नहीं कर पाए। साथ ही में राज्य सरकार की नाकामी पर भी सवाल खड़े हो रहे हैं। आखिर वो मज़दूरों को पर्याप्त साधन क्यों नहीं दे पा रही ताकि उन्हें इस तरह शहर छोड़के जाना न पड़े।

अप्रैल में आए ‘SWAN’ के सर्वे के मुताबिक देश में करीब 96% प्रवासी मज़दूरों को राशन नहीं मिल रहा है इस काम को करने में केंद्र और राज्य सरकारें, दोनों असफल रहीं।

क्या मज़दूरों पर लाठीचार्ज कर उन्हें हटाना कोई समाधान है? इसके साथ-साथ प्रशासन ने पहले हुई भूल-चूक को क्यों नहीं सुधारा? मज़दूरों को इतनी बड़ी संख्या में स्टेशन पर इकट्ठा होना भी बीमारी के नज़रिए से खतरनाक है।

करीब 50 मज़दूर जो महाराष्ट्र से उत्तर प्रदेश पहुंचे हैं, कोरोना संक्रमित पाए गए हैं। सही उपाय तो यही है कि जब तक मज़दूरों का अपने घर वापस जाने का ठीक से प्रबंध नहीं हो जाता, तब तक उन्हें उसी राज्य में राशन और ज़रूरत का सामान उपलब्ध करवाया जाए।

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