बीजेपी ने 2014 के लोकसभा चुनाव में विनिंग मैनिफेस्टो जारी किया था। चुनाव जीत गए। नरेंद्र मोदी प्रधानमंत्री बने। कार्यकाल भी लगभग खत्म हो चुका है। कुछ दिन बाद से पहले सत्र के चुनाव का दौर शुरू हो जाएगा।

लेकिन बीजेपी अपने मैनिफेस्टो के कई वादों को भूल गया। कुछ वादे जुमला हो गए, कुछ फर्जी एजेंडों के बीच दबकर खत्म हो गएं। ऐसा एक वादा था मैन्युअल स्कैवेंजर्स यानी हाथ से मैला साफ करने वालों के अधिकार सुरक्षित करने का।

बीजेपी ने अपने घोषणा पत्र के 16 वे पन्ने पर मैन्युअल स्कैवेंजर के अधिकारों को सुरक्षित करने की बात लिखी थी। लेकिन इन पांच साल में मैन्युअल स्कैवेंजरिंग के खिलाफ कोई कदम नहीं उठाया गया। आज भी एक वर्ग गटर में जान देने को मजबूर है।

सामाजिक न्याय और अधिकार मंत्रालय दवारा 8 दिसंबर 2018 को जारी आंकड़े बताते हैं कि हमारे देश में 13973 मैन्युअल स्कैवेंजरों की पहचान हुई है। जबकि हमारा संविधान इसकी अनुमति नहीं देता। बावजूद इसके ये प्रथा अभी तक समाप्त नहीं हुई है।

The Prohibition of Employment as Manual Scavengers and their Rehabilitation Bill, 2012 मैला ढोने वालों के अधिकारों का संरक्षण करता है। इस बिल ने मानव मल-मूत्र को हटाने के लिये सफाई कर्मचारियों के नियोजन को अपराध घोषित किया है।

सभी राज्यों में जल-सील (सैनेटरी) शौचालयों का निर्माण कराना अनिवार्य है। इस बिल में लिखे कानून का पालन ना करने पर एक साल की सजा या 50,000 रूपए का जुर्माना हो सकता है। लेकिन इस बिल की कमियां ही इस बिल को ले डूबी हैं।

इस बिल में जल-सील शौचालय बनाने या पहले से निर्मित इंसेंटरी शौचालयों को गिराने को कहा गया है। इस बिल में आगे कहा गया कि वित्तीय सहायता प्रदान करने के लिए राज्यों और केंद्र की सरकार बाध्य नहीं है। ये सरकार की चल रही इंसेंटरी लैट्रिन के रूपांतरण पर वर्तमान नीति का विरोधाभास है।

‘इंटीग्रेटेड लो कॉस्ट स्वच्छता योजना’ के तहत शौचालय बनाने का 75 प्रतिशत खर्चा सरकार और 15 प्रतिशत खर्चा राज्य उठाता था। परन्तु इस बिल में केंद्र और राज्य शौचालय के निर्माण का कोई भी खर्चा उठाने के लिए अनिवार्य नहीं है।

बता दें उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, राजस्थान, बिहार, गुजरात और महाराष्ट्र में सबसे ज़्यादा ड्राई-लैट्रिन हैं। सीवर सफाई कर्मचारियों की ज़िन्दगी गरीबी और मौत के दो भागों में बटी है।

हमारे पैर नहींअपने मन को साफ कीजिए मोदी जी, 2018 में 105 सफाईकर्मी मर गए और आप चुप रहे : बेजवाड़ा विल्सन

दिल्ली के दिलशाद गार्डन इलाके में ताहिरपुर सराय स्थित बालमीकि बस्ती में अधिकतर लोग सीवर की सफाई का काम करते हैं। यहाँ रहने वाला बबली सीवर में सफाई करने उतरा और ज़हरीली गैस का शिकार हो गया। कांट्रेक्टर ने बबली के परिवार को केवल डेढ़ लाख रूपए का मुआवज़ा दिया था।

8 जुलाई 2018 को गाज़ियाबाद की लोनी कॉलोनी में तीन सफाई कर्मियों की दम घुटने से मौत हो गई। आंकड़े इस से कई ज़्यादा है। दिल्ली में पांच सालों के भीतर 74 सफाई कर्मचारियों की मौत सीवर और सेप्टिक टैंक साफ़ करने के दौरान हुई।

1993 में जब मैन्युअल स्कवेंजरिंग पर रोक लगी तब से अब तक 1800 से ज़्यादा सीवर कर्मियों की मौत को सूचीबद्ध किया गया है। वास्तविक संख्या इस से कई ज़्यादा है।

2016 में रेमोन मैगसेसे पुरूस्कार से सम्मानित और सफाई कर्मचारी आंदोलन के पदचालक बेजवाड़ा विल्सोन का दलित परिवार पीढ़ियों से सर पर मैला उठता रहा। उन्होंने अपने एक इंटरव्यू में बताया कि असली आंकड़े इन सरकारी आंकड़ों से दस गुना ज़्यादा है लेकिन वो रिपोर्ट नहीं होते।

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बेजवाड़ा विल्सन

विल्सन के आंदोलन का ही नतीजा था की देश में मैन्युअल स्कवेंजरिंग को लेकर कानून बना। विल्सन बताते है कि आज भी दो लाख दलित महिला हाथ से मैला उठाने का काम करती है।

विल्सोन ने कहा, ‘ये महिलाएं घर में बने ड्राई- लैट्रिन साफ़ करती है और महीना का केवल 10 से 30 रूपए कमाती है। ये महिलाएं 5 से 10 टॉयलेट साफ़ करती है। इन महिलाओं के स्वास्थ्य पर कोई ध्यान नहीं देता है।’

गौर करने वाली बात ये भी है कि स्वच्छ भारत अभियान को ग्लैमरस बनाने के लिए सरकार ने 2017-18 बजट में 12,800 करोड़ रूपए दिए। लेकिन मानव अधिकारों से संघर्ष कर रहे मैन्युअल स्कवेंजरिंग के लिए सरकार ने केवल 5 करोड़ रूपए आवंटित किये।

विल्सन अपने परिवार में पहले पढ़े-लिखे शख्स हैं। स्कूल में जब विल्सन के साथ छुआ-छूत का व्यवहार हुआ तब विल्सन को गुस्सा आया। उन्होंने इस गुस्से को बदलाव की शक्ल दी। उन्होंने लाखों सफाई कर्मचारियों को एक किया और संघर्ष के रास्ते ले गए।

सत्ता के लालची नेता केवल भाषण देकर चले जाते हैं। सडकों पर, गलियों में और बस्तियों के अंदर क्या स्थिति है उस से उन्हें कोई मतलब नहीं। राष्ट्रवाद इस देश में तभी जागता है जब बॉर्डर पर जवान शहीद होते हैं।

देश को सुरक्षित रखने के लिए देश के अंतर कौन-कौन मर रहा है इसका कोई हिसाब नहीं रखता। किसी का मल-मूत्र ढ़ोने वाले की मौत हो जाए तो बस कुछ हज़ार दान दे दिए जाते है। उसे शहीद नहीं बोला जाता। आज़ादी के इतने साल बाद और विकास के तमाम दावे भरने के बाद भी ऐसे कई लोग है जो सर पर दूसरा का मल-मूत्र उठाते है और ये ‘महान भारत’ के लिए शर्मनाक है।

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