देश की राजधानी दिल्ली से 150 किलोमीटर की दूरी पर स्थित बिजनौर लोकसभा सीट पर इस बार बीजेपी के लिए राहें  आसान नहीं होंगी। ऐसा इसलिए क्योंकि दो बार विधायक रहे, मौजूदा लोकसभा सांसद कुंवर भारतेंद्र सिंह के काम से जनता संतुष्ट नहीं है। बीजेपी के कमजोर पड़ने की वजह दूसरी ये भी है की इस सीट पर सपा-बसपा गठबंधन का असर पड़ना तय है।

दरअसल बिजनौर में पहले चरण में चुनाव में होने हैं। ऐसे में सभी राजनीतिक दलों ने अपने अपने उम्मीदवार मैदान में उतार दिए है। बीजेपी जहां अपने मौजूदा सांसद कुंवर भारतेंद्र सिंह को टिकट दिया वहीं कांग्रेस की तरफ से नसीमुद्दीन सिद्दीकी को टिकट मिला है। बसपा ने मलूक नागर को टिकट दिया है।

मायावती ने बिजनौर जीतकर राष्ट्र राजनीति में बनाई थी अपनी पहचान

इस सीट का महत्व तब ज्यादा बढ़ जाता है जब बहुजन समाज पार्टी की वर्तमान अध्यक्ष मायावती इसी सीट से करीब 183,189 वोट पाकर जीत दर्ज करती हैं और लोकसभा में अपनी जगह बनाने में सफल होती हैं।

ये वही वक़्त था जब बहुजनों ने मायावती के लिए नारा दिया ‘कांशीराम का मिशन अधूरा बहन मायावती करेंगी पूरा।’ इसी सीट से जीतने के बाद मायावती राष्ट्र की राजनीति में अपनी पहचान बनाने में सफल होती हैं। अब एक बार फिर मायावती की कोशिश होगी कि वो बिजनौर से बसपा को जीत दिलवाए।

कुंवर भारतेंद्र सिंह ने ना विधायक रहते काम किया और ना ही सांसद रहते

साल 2014 के लोकसभा चुनाव में जब देश को सपने दिखाए जा रहे थे उसी वक़्त में दो बार के विधायक रहे बीजेपी सांसद कुंवर भारतेंद्र सिंह 45.92 फीसदी 4,86,913 पाकर जीत हासिल करते है। मगर पांच साल गुजर जाने के बाद और सांसद बन जाने के बाद वो ना तो जनता के बीच काम को लेकर और ना गांव की ओर कोई रुख करते हैं।

जिसकी वजह से बिजनौर निवासियों का मन अब अपने सांसद से नाराज़ हैं। जिसकी वजह वो इस बार बीजेपी के विकल्प तलाश रहें है। वैसे सपा-बसपा-आरएलडी (महागठबंधन)को इस सीट पर फायदा पहुँचता नज़र आ रहा है। क्योंकि अगर पिछले ही लोकसभा चुनाव की बात करें तो इन तीन दलों ने मिलकर 5,35611 मत हासिल किये थे।

तीन दलों के वोट प्रतिशत भी मिला दिए जाए तो 50 फीसद ज्यादा हो जाते है। जबकि पिछले चुनाव में बीजेपी उम्मीदवार 45 फीसद पाकर ही बड़ी जीत हासिल करते हैं।

बिजनौर लोकसभा सीट में 5 विधानसभा सीटें आती हैं। बिजनौर और चांदपुर विधानसभा बिजनौर जनपद में हैं, जबकि मुज़फ्फरनगर में पुरकाजी और मीरापुर विधान सभा आ रही हैं। वहीं हस्तिनापुर विधानसभा मेरठ जनपद का हिस्सा है।बिजनौर लोकसभा में कुल 16,51,105 वोटर्स हैं। जिनमें 8,87589 पुरुष और 7,63430 महिला वोटर्स हैं।

मुस्लिम बाहुल्य लोकसभा में आज़ादी के बाद से बिजनौर को मिला अबतक सिर्फ 1 मुस्लिम सांसद

ये हैरान करने वाली बात है इस सीट पर आज़ादी के बाद से सिर्फ एक ही मुस्लिम उम्मीदवार जीतकर लोकसभा में पहुँच पाता है। अब कांग्रेस ने इसी समीकरण को देखते हुए बसपा से कांग्रेस में आए नसीमुद्दीन सिद्दीकी पर दांव लगाया है।नसीमुद्दीन बसपा सुप्रीमो के करीबी रहे हैं इस वजह से उन्हें बीजेपी से लड़ने का अनुभव पुराना है मगर बसपा के खिलाफ उनकी ये पहली लड़ाई है।

अब देखना दिलचस्प होगा कि कभी रामविलास पासवान, मीरा कुमार और मायावती जैसे नेता जिस सीट का महत्व बढ़ा चुके हो वहां जनता महागठबंधन पर भरोसा करती है या फिर कांग्रेस और बीजेपी को चुनती है क्योंकि आकड़ों के हिसाब से तो महागठबंधन का दबदबा इस सीट पर ज्यादा बन रहा है बाकि बीजेपी और कांग्रेस के लिए इस सीट पर जीत हासिल करना किसी चुनौती से कम नहीं है।

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