लोकसभा चुनाव से पहले देशभर में महिलाओं ने मार्च किया। राजधानी दिल्ली में भी महिलाओं ने मंडी हाउस से जंतर मंतर तक मार्च निकाला।

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देश भर में नफरत और हिंसा के मौजूदा माहौल के विरोध में इस मार्च का आयोजन किया गया जिसमे सैंकड़ों महिलाओं ने हिस्सा लिया। ‘औरतें उठी नहीं तो ज़ुल्म बढ़ता जाएगा’ बैनर तले हजारों महिलाएं मार्च में शामिल हुईं।

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इस कार्यक्रम को लेकर जारी प्रेस रिलीज़ में लिखा कि पिछले पांच वर्षों में महिलाओं में गुस्सा बढ़ा है। उनके संघर्ष को दबाया गया और उन्हें कमज़ोर समझा गया। महिलाओं के खिलाफ अत्याचार तब तक नहीं रुकेंगे जब तक समाज में बढ़ रही हिंसा कम नहीं हो जाती।

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वह सरकार जो राजनीतिक शक्ति का उपयोग करने के लिए क्रूर बल का उपयोग करती है, वो महिलाओं के अधिकारों की आवाज़ नहीं हो सकती। पिछले पांच सालों से मौजूदा सरकार देश के नागरिकों के खिलाफ ही जंग लड़ रही है- लिंचिंग, भड़काऊ भाषण, लोगों पर ‘देशद्रोह’ का टैग लगाकर उनकी गिरफ्तारी करना, उन्हें ‘एंटी- नेशनल’ और ‘अर्बन नक्सल’ कहना आदि।

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सामाजिक कार्यकर्ता और नेशनल कैंपेन फॉर पीपल्स राइट टू इन्फॉर्मेशन की सह-संयोजक अंजलि भारद्वाज का कहना है कि संवैधानिक अधिकारों के लिए महिलाएं मार्च कर रही हैं। महिलाओं के प्रति असमानता बढ़ती जा रही है। इसका महिलाओं पर गलत प्रभाव पड़ा है। रेप और भेदभाव की घटनाओं ने महिलाओं को उनके लोकतान्त्रिक अधिकारों का प्रयोग करने की क्षमता को कम कर दिया है।

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चुनाव से पहले इस मार्च को करने का कारण बताया हुए महिलाओं ने कहा कि वे सरकार की ऐसी किसी भी नीतियों का समर्थन नहीं करती जो असमानता, भेदभाव और घृणा का प्रचार करती हों। महिलाएं वोट करने के दौरान इन मुद्दों को ध्यान रखेंगी। वो इसे बढ़ावा देने वालों को कभी वोट नहीं देंगी।

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मार्च में मौजूदा सामाजिक कार्यकर्ताओं ने सरकार द्वारा ‘बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ’ प्रोग्राम को पूरी तरह असफल बताया है। शिक्षा पर सार्वजनिक वित्त पोषण जीडीपी के 6.1% से 3.7% तक कम है, जबकि निजीकरण को बढ़ावा दिया जा रहा है। आदिवासी, दलित और मुस्लिम लड़कियां 10 वीं कक्षा तक भी नहीं पढ़ पाती।

देश भर से आईं छात्राएं, एक्टिविस्ट और पेशेवर महिलाएं इस मुहीम में साथ दिखीं। औरतों ने तरह-तरह के नारे लगाए, जैसे- ‘चौकीदार से आज़ादी’, ‘लिंचिंग से आज़ादी’, पितृसत्ता से आज़ादी’, प्यार करने की आज़ादी’

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मार्च में अल्पसंख्यकों, दलित महिलाओं और LGBTQ के अधिकारों के लिए भी आवाज़ उठाई गई। LGBTQ समुदाय के लोग भी इस मार्च में अपनी भूमिका निभाते देखे गए। वे चाहते हैं कि उन्हें सामाज में समान दर्जा मिले। न कुछ ज्यादा, न कुछ कम।

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