हमारी जनरेशन युद्ध चाहती है क्योंकि हमने देखा है बोर्डर मूवी में युद्ध का सौंदर्यीकरण।
अगर हमने देखा होता सन् 47 का बँटवारा,

अगर हमने देखा होता सैनिकों को युद्ध में खो चुके अपने शरीर के अंगो को ढूंढते हुए,
अगर हमने देखा होता विजय के बाद अपने मृत साथियों के क्षत-विक्षत शवों के पास बैठे सैनिकों का सूनापन,

अगर हमने देखा होता गोली लगने के बाद सैनिकों कि आँसू का सूखापन,
तो शायद,

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शायद हम युद्ध को लेकर इतना उतावलापन ना दिखाते।
वीर रस के गीत जोश जरूर जगाते है,
पर वो रोक नही सकते लहू कि धार।

युद्ध अगर नियती भी है, तो हम भी मनुष्य है।
हम बदल सकते है नियती।
युद्ध अंतिम विकल्प जरूर है,
परन्तु प्रथम कभी नही।

  • पुष्पराज

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