आँख खुलती है. ख़बर मिलती है कि बाहरी दिल्ली में एक 90 साल की बुज़ुर्ग महिला का बलात्कार हुआ है. पहले विश्वास नहीं होता है. सोचा कहीं फेक न्यूज़ तो नहीं. परखने के बाद मालूम हुआ ख़बर सही थी.

दिल्ली महिला आयोग की प्रमुख स्वाति मालिवाल ने बताया कि महिला के “हाथ पूरी तरह झुर्रियों से भरे हैं. आपको सदमा लगेगा जब आप उनकी कहानी सुनेंगे. उनके चेहरे और शरीर पर निशान पड़े हैं और उन्हें ख़ून भी आया. वे काफ़ी डरी और घबराई हुई हैं.”

मेरी ज्ञात में संभवतः वो सबसे बूढ़ी महिला होंगी जिसका रेप हुआ हो. कुछ और घटनाएं भी इन्हीं दिनों घटित हुईं. एक तीन साल की बच्ची का रेप हुआ. शादी में आए एक रिश्तेदार ने ऐसा किया. एक अलग केस में एक कोरोना की मरीज़ का उसके एम्बुलेंस ड्राइवर ने रेप किया. अप्रैल में मध्य प्रदेश में छह बरस की लड़की का रेप किया और उसकी आंखें फोड़ दीं. उत्तर प्रदेश में एक 13 साल की लड़की का रेप हुआ.

उसके पिता ने कहा “हमने बेटी को देखा तो उसकी आंखें बाहर निकली हुई थीं और जीभ काट दी गई थी.” आंखों की तारीफ़ करते ना थकने वाले मर्द, रेप करने के बाद आंखों से डर जाते हैं. कहीं वो लड़की बोल ना दे, ज़बान से डर जाते हैं. सिर्फ़ बलात्कार की घटनाओं का ज़िक्र करें तो देश में प्रति 15 मिनट एक रेप होता रहा है. ये वो आंकड़े हैं जो पुलिस में दर्ज हैं. ना दर्ज होने वाले केस का कोई ठिकाना नहीं.

बलात्कार की घटना अपने आप में मीडिया संस्थानों के लिए न्यूज़ नहीं होती. मतलब अखबारों ने और न्यूज़ चैनलों ने ये मान लिया है की बलात्कार “नॉर्मल” है और या फिर ये “न्यूज़ वर्दी” नहीं है. यही न्यूज़ चैनल्स #जस्टिसफॉरसुशांत हैश्टैग चलाते हैं. कुल 24 घंटे चलने वाले न्यूज़ चैनल्स के पास दो मिनट नहीं होता कि वो सदैव बढ़ते बलात्कार की घटनाओं पर स्टोरी करें. किसी चैनल ने इस मुद्दे पर अपने स्लॉट में आधे घंटे का एपिसोड नहीं चलाया,

किसी अख़बार ने कॉलम नहीं छापा, सिरीज़ नहीं शुरू की. टीआरपी और सेंसेशनालिज़्म के चक्कर में, और पॉलिटिकल बॉस को खुश करने में पत्रकारों ने पत्रकारिता का गला घोंट दिया. ये क्या न्याय की बात करेंगे, ये न्यूज़ चैनल्स, जो दिनभर औरतों को एक खिलौना के रूप में प्रेज़ेंट करते हैं,

उनको उनके बेसिक सम्मान से वंचित कर देते है, वो टीवी पर अगर रेप के मुद्दों पर बात करने लगें, तो अधिकतर TV की रेटिंग बैठ जाएगी. मैक्सिमम रेप मेंटैलिटी के लोग TV देखना बंद कर देंगे. तो मालूम हुआ, कि बलात्कार की घटनाओं पर बात ना करके TV, rape मेंटैलिटी वालों की नाक ऊँची कर रहा है. उनको शय दे रहा है, बढ़ावा दे रहा है.

और, लोग, ये सब देख देख कर इन टेलिविज़न स्टूडीओ में बैठे युद्ध उन्मादी ऐंकरों को महत्व देते रहते हैं. वो भी उस सर्कस का हिस्सा बन जाते हैं, जो ये टीवी उनको दिखाते रहते हैं. ये टीवी से कभी माँग नहीं करेंगे कि उस बूढ़ी महिला के रेप की ख़बर चलाओ, उस बच्ची के रेप की ख़बर दिखाओ, उस पत्नी की ख़बर दिखाओ, जिसका रेप, रेप नहीं माना जाता. उस गर्ल्फ़्रेंड की ख़बर दिखाओ, जिसका रेप करने के बाद लड़का कहता है “ज़बरदस्ती का सैक्स हो गया”.

लोगों ने कभी पत्रकारिता से ये माँग ही नहीं कि की उसको उस उस भतीजी कि खबर दिखाओ, जिसको चाचा ने ग़लत जगह हाथ लगाया. उस बेटी की ख़बर दिखाओ, जिसको उसके बाप ने छेड़ा और सेक्शूअली हरैस किया.

इन सच्चाई से कोई रूबरू होना नहीं चाहते. कठिन है, कड़वा है, सच है. इस पोस्ट को लिखते हुए आधे घंटे लग गए हैं. कम से कम, सरकारी आँकड़ो के हिसाब से इस आधे घंटे में दो महिलाओं का बलात्कार हो चुका होगा. ना जाने लोगों की आँखें कब खुलेंगी.

(ये लेख गरिमा चौधरी की फेसबुक वॉल से साभार लिया गया है)

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