रेलवे ने 14 अप्रैल से 30 अप्रैल तक 39 लाख टिकटें बुक की। मज़दूर रेलवे स्टेशन पहुँचने लगे। अब बेचारे मज़दूरों के घर में टीवी है नहीं, अख़बार अफ़ॉर्ड नहीं कर सकते, सभी के पास स्मार्ट फ़ोन हो यह ज़रूरी नहीं। अगर है भी तो वो न्यूज़ देखते है कि नहीं वो अलग विषय। इसलिए सब पहुँच गए रेलवे स्टेशन।

अब रेलवे का दोष ग़रीबों पर निकाल दो। भीड़ जमा हो जाए तो स्टेशन को मस्जिद बता दो। जिस राज्य में ग़ैर-भाजपा सरकार हो उसको अपनी पालतू मीडिया से ख़ूब सुनवाओ।

मुंबई से अधिक भीड़ सूरत, गुजरात में थी लेकिन वो ठहरा गुजरात और वहाँ है भाई लोगों की सरकार। किसमें दम है वहाँ के Visuals दिखा दें। वहाँ की सरकार से सवाल-जवाब कर सके।

क्या है मामला

दरअसल, मुंबई के बांद्रा स्टेशन पर लॉकडाउन को तोड़ते हुए हजारों की संख्या में प्रवासी मजदूर इकट्ठा हो गए। और घर जाने की जिद्द करने लगे। ऐसे वक्त में हजारों लोगों का एक जगह एकत्रित होना बेहद चिंताजनक था।

लेकिन शायद पेट की भूख ने कोरोना के डर को इन गरीब मजदूरों के दिल से निकाल दिया है। तभी भूख मौत पर हावी हो गई। ये शायद उन सरकारों की भी नाकामी है जो इन गरीबों को दो वक्त का खाना नहीं दे सकी। प्रधानमंत्री मोदी ताली-थाली और दीए में लगे रहे गरीबों के कोई राहत पैकेज लेकर नहीं आए।

 

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