कृष्णकांत

इस तस्वीर को देखिए और याद कीजिए कि भारत के पास दुनिया का चौथा सबसे बड़ा रेल नेटवर्क है. भारत विश्व में अहम स्थान रखने वाली अर्थव्यवस्था है. इस व्यवस्था की रीढ़ अब भी खेती और असंगठित क्षेत्र है. इन क्षेत्रों में काम करने वाले लोग, रेल की पटरियां बिछाने वाले लोग इतिहास का सबसे भयावह पलायन झेल रहे हैं. यह व्यवस्था मूक दर्शक बनी उन्हें देख रही है.

इस देश में 20-20 साल के युवा कभी फांसी पर चढ़े थे. उन युवाओं की चिट्ठियां, उनके भाषण, उनके पर्चे इस बात के गवाह हैं कि वे सच में एक आजाद और आत्मनिर्भर भारत चाहते थे. ऐसा भारत, जहां जनता की चुनी हुई अपनी सरकार हो और किसी बच्चे को ऐसे मौत के मुंह में न झोंक दिया जाए.

वे इस उम्मीद में फांसी चढ़े कि गोरे यहां से चले जाएंगे तब भारत आजाद होगा. सबके पास खाने को रोटी होगी, सब हाथों में रोजगार होगा. सबके लिए जीवन की गारंटी होगी.

हालांकि, भगत सिंह ने अपनी मां को लिखी में डर जताया था कि भूरे अंगरेजों से भी खतरा है. वह खतरा छुपा हुआ था, आज सामने आ गया है.

कुछ दिन पहले बुलेट ट्रेन के लिए दुबले हुए जा रहे महानुभाव ने कहा है कि आत्मनिर्भर बनो.

उसी वक्त एक मां ट्रॉली बैग पर बच्चे को लटकाए हुए पंजाब से झांसी के लिए पैदल जा रही है. बताया जा रहा है कि बच्चा थककर बैग पर लटका है और सो रहा है. यह तस्वीर शायद आगरा में खींची गई है.

इसकी कल्पना किसने की थी कि 2020 में एक आपदा के वक्त लाखों गरीबों को मरने के लिए छोड़ दिया जाएगा?

खजाना भरा है. बैंक लुट रहे हैं. लाख करोड़, हजार करोड़ का जुमला फेंका जा रहा है ताकि जनता को लगे कि बहुत कुछ हो रहा है.

लेकिन हो क्या रहा है? लाखों की संख्या में बच्चे, महिलाएं, बुजुर्ग, गर्भवती मांएं, नौजवान, सब पलायन को मजबूर हैं. इसलिए कि उन्हें रोटी नहीं मिल रही थी. वे अपने गांव भाग रहे हैं. पैदल. जान गवांते हुए. इन पर अब तक एक शब्द भी खर्च नहीं किया गया है.

(ये लेख पत्रकार कृष्णकांत के फेसबुक वॉल से साभार लिया गया है)

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