आज पूरा हिंदुस्तान महंगाई की मार से कराह रहा है। एक तो बेरोजगारी ऊपर से दिन प्रतिदिन बढ़ती महंगाई ने आम आदमी का जीना मुहाल कर दिया है।

सरकार है कि कुछ कहने, सुनने, करने को तैयार नहीं, मीडिया है जो बेलगाम होती महंगाई पर चर्चा भी करना नहीं चाहती।जनता बेचैन है, परेशान है, हैरान है, विवश है लेकिन उपाय क्या है चुप रहने के अलावा।

भारत में इन दिनों कथित राष्ट्रवादी भारतीय जनता पार्टी की सरकार है। नरेंद्र मोदी जैसे कथित हिन्दू हृदय सम्राट यशस्वी प्रधानमंत्री हैं। विश्व की सबसे बड़ी मिस्ड कॉल वाली पार्टी का विशाल आईटी साम्राज्य है।

करोड़ों खर्च कर बनाई गई ट्रोल आर्मी है। गोद में खेलने वाली गोदी मीडिया है। मालिक जैसे जैसे कान घुमाता है, गोदी मीडिया वैसे वैसे अलापना शुरू कर देता है।

जैसे ही मीडिया और सोशल मीडिया में महंगाई की चर्चा शुरू होती है, तत्काल मुसलमान और पाकिस्तान का राग दरबारी शुरू हो जाता है।

कभी कभी तो दिमाग में एक सवाल तैरने लगता है कि अगर पड़ोस में पाकिस्तान और देश में मुसलमान न होते तो देश का राष्ट्रीय मुद्दा क्या होता?

चुनावी विश्लेषक एवं रणनीतिकार अंकित लाल महंगाई के मुद्दे पर ट्वीट करते हुए कहते हैं कि “पाकिस्तान की बात करेंगे, दुनिया की बात करेंगे – देश की बात नहीं करेंगे.”

पेट्रोल डीजल की लगातार बढ़ती कीमतों के बीच रोजमर्रा की ज़रूरतों की चीजें भी महंगी होती जा रही हैं। नहाने के साबुन से लेकर खाने के तेल और रसोई गैस की कीमतों में भी आग लगी हुई है। सब्जी, फल, दूध आदि में महंगाई रिकॉर्ड स्तर पर पहुंची हुई है।

सवाल तो आज इस हद तक जा पहुंचा है कि आम आदमी खाए तो क्या खाए, पहने तो क्या पहने.. आज की तारीख में कोई ऐसी वस्तु नहीं जिसकी कीमतों में बढ़ोतरी न हो रही हो।

हर कोई महंगाई की इस ज्वलन्त समस्या से परेशान है लेकिन सबका ब्रेन वाश किया जा चुका है।

सरकारी तोते के तौर पर काम कर रही मीडिया लोगों के दिलों दिमाग में यह बात बताने में सफल रही है कि देश की असली समस्या मंहगाई और बेरोजगारी नहीं, बल्कि पाकिस्तान और मुसलमान हैं।

आईटी सेल तो यह संदेश फैलाने में जोरदार तरीके से सफल रही है कि हमने पीएम मोदी के रूप में एक शेर पाला है और शेर को पालना महंगा होता है, हालांकि लोग यह नहीं समझ पा रहे कि शेर पालना महंगा ही नहीं जानलेवा भी होता है क्योंकि शेर आदमखोर भी होता है !

हालांकि यह एक भ्रम है। शासन चलाने के लिए किसी जानवर की नहीं बल्कि एक संवेदनशील जननायक की ज़रूरत होती है जो आम लोगों की तकलीफों को समझता हो, किंतु भ्रम चाहे जैसा भी हो, टूटता ज़रूर है।

यह भ्रम भी टूटेगा, देर सबेर ही सही…हां ये अलग बात है कि तब तक काफी देर हो चुकी होगी।

संभव है कि लोगों को रोने के लिए आंसू भी नसीब न हो क्योंकि आज मुद्दा अपना घर परिवार नहीं बल्कि पाकिस्तान हो चुका है। हमने मंहगाई कम करने वाली नहीं बल्कि पाकिस्तान को सबक सिखाने के लिए सरकार चुनी है !

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